भारत के महान वैज्ञानिक और उनकी खोजें
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भारत के वैज्ञानिकों की परंपरा बहुत पुरानी है: आर्यभट ने 499 ईस्वी में π का मान लगभग 3.1416 और पृथ्वी के घूमने का विचार दिया, 'सुश्रुत संहिता' में नाक की प्लास्टिक सर्जरी का वर्णन है, रामानुजन ने संख्याओं के विभाजन पर काम किया और जगदीश चंद्र बसु ने 1890 के दशक में रेडियो तरंगों और पौधों पर शोध किया। इस सूची में इनके साथ आधुनिक भारत के कई वैज्ञानिक हैं, और हर एक की खोज उतनी ही बताई गई है जितनी प्रमाणित है।
यह सूची कैसे चुनी गई
'भारत के महान वैज्ञानिक' वाली बहुत सी सूचियाँ दावों को बढ़ा चढ़ाकर लिखती हैं, जैसे 'आर्यभट ने शून्य खोजा' या 'बसु ने रेडियो बनाया'। हमने हर व्यक्ति के लिए वही लिखा है जो उनके ग्रंथों, शोध पत्रों और मानक इतिहास में मिलता है, और जहाँ बहस है वहाँ उसे बताया है।
चार व्यक्तियों पर हमारे विस्तृत लेख हैं। उनके बाद प्राचीन और आधुनिक भारत के दूसरे वैज्ञानिक संक्षेप में हैं, ताकि आप प्रोजेक्ट के लिए आगे खोज सकें।
आर्यभट (जन्म 476 ईस्वी): गणित और खगोल
आर्यभट ने 499 ईस्वी में कुसुमपुर (आम तौर पर पाटलिपुत्र माना जाता है) में 121 श्लोकों का ग्रंथ 'आर्यभटीय' लिखा। इसमें दशमलव स्थानीय मान पर आधारित गणनाएँ, π का मान 62,832 ÷ 20,000 यानी लगभग 3.1416, ज्या की तालिका, कुट्टक विधि, ग्रहणों की छाया से व्याख्या और पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का विचार है।
कम जाना तथ्य: उन्होंने π के मान को ख़ुद 'आसन्न', यानी लगभग, कहा। और उन्होंने शून्य का चिह्न या उसके नियम नहीं दिए; वे ब्रह्मगुप्त ने 628 ईस्वी में लिखे। स्रोत: 'आर्यभटीय', वॉल्टर क्लार्क का अनुवाद (1930)। पढ़ें: आर्यभट का योगदान।
सुश्रुत: प्राचीन शल्य चिकित्सा
सुश्रुत आयुर्वेद के ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' से जुड़े शल्य चिकित्सक और शिक्षक माने जाते हैं। इस ग्रंथ में कटी हुई नाक को गाल की त्वचा के टुकड़े से फिर बनाने की विधि (सूत्रस्थान, अध्याय 16), मोतियाबिंद को एक औज़ार से आँख की सीध से हटाने, मूत्राशय की पथरी निकालने और सौ से अधिक औज़ारों का वर्णन है। छात्रों को सलाह है कि वे मरीज़ से पहले लौकी, तरबूज़ और चमड़े पर चीरा और टाँका लगाने का अभ्यास करें (सूत्रस्थान, अध्याय 9)।
कम जाना तथ्य: 'सुश्रुत संहिता' सदियों में परतों में बनी। इसका मूल शायद पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व का है, अंतिम भाग 'उत्तरतंत्र' बाद में जुड़ा, और नेपाल में मिली 878 ईस्वी की ताड़पत्र पांडुलिपि इसका एक शुरुआती रूप बचाए हुए है। इसलिए '600 ईसा पूर्व' जैसी पक्की तारीख़ लिखना सही नहीं। 1794 में पुणे के पास हुई नाक की ऐसी ही सर्जरी का वर्णन लंदन की 'Gentleman's Magazine' में छपा था, जिससे यूरोप के सर्जन इस तकनीक से परिचित हुए। पढ़ें: सुश्रुत और शल्य चिकित्सा।
श्रीनिवास रामानुजन (1887 से 1920): संख्याओं के जादूगर
कुंभकोणम के लगभग स्वयं शिक्षित गणितज्ञ, जिन्होंने 16 जनवरी 1913 को कैम्ब्रिज के जी. एच. हार्डी को पत्र लिखा और 1914 में इंग्लैंड गए। उन्होंने संख्याओं के विभाजन, अनंत श्रेणियों, π की श्रेणियों और मॉक थीटा फ़ंक्शन पर काम किया। 1918 में वे रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो बने और 26 अप्रैल 1920 को 32 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।
कम जाना तथ्य: उनकी अंतिम वर्ष की 'खोई हुई नोटबुक' 1976 में ट्रिनिटी कॉलेज के पुस्तकालय में मिली। उनका जन्मदिन 22 दिसंबर राष्ट्रीय गणित दिवस है। स्रोत: Berndt और Rankin, 'Ramanujan: Letters and Commentary' (1995)। पढ़ें: रामानुजन की जीवनी और राष्ट्रीय गणित दिवस।
जगदीश चंद्र बसु (1858 से 1937): रेडियो तरंगें और पौधे
प्रेसिडेंसी कॉलेज, कलकत्ता में 1894 से 1896 के बीच बसु ने मिलीमीटर तरंगदैर्घ्य की रेडियो तरंगें बनाईं और पकड़ीं, और गैलेना क्रिस्टल वाला डिटेक्टर बनाया (अमेरिकी पेटेंट 755,840, 1904)। बाद में उन्होंने पौधों की विद्युत प्रतिक्रियाओं पर शोध किया और उनकी बहुत धीमी वृद्धि दर्ज करने के लिए क्रेस्कोग्राफ बनाया। 30 नवंबर 1917 को उन्होंने कलकत्ता में बोस संस्थान की स्थापना की।
कम जाना तथ्य: वे पेटेंट कराने के विरोधी थे और मित्रों के ज़ोर देने पर ही एक पेटेंट लिया। उन्होंने रेडियो प्रसारण प्रणाली नहीं बनाई; उनका काम तरंगों का वैज्ञानिक अध्ययन था। स्रोत: 'Response in the Living and Non-Living' (1902)। पढ़ें: जगदीश चंद्र बसु की जीवनी।
प्राचीन और मध्यकालीन भारत के दूसरे विद्वान
- बौधायन (लगभग 800 से 500 ईसा पूर्व, अनुमान): 'शुल्बसूत्र' में यज्ञ वेदियाँ बनाने के नियमों में आयत के विकर्ण का वह संबंध है जिसे आज पाइथागोरस प्रमेय कहते हैं।
- चरक: 'चरक संहिता' आयुर्वेद का काय चिकित्सा (आंतरिक रोगों) का प्रमुख ग्रंथ है; सुश्रुत संहिता की तरह यह भी परतों में बना।
- वराहमिहिर (छठी सदी): 'पंचसिद्धांतिका' में उस समय के पाँच खगोल सिद्धांतों का सार और 'बृहत्संहिता' में मौसम, वनस्पति और वास्तु जैसे विषय।
- ब्रह्मगुप्त (598 से लगभग 668 ईस्वी): 628 ईस्वी के 'ब्रह्मस्फुटसिद्धांत' में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं के साथ गणित के नियम।
- भास्कर द्वितीय (1114 से 1185 ईस्वी): 1150 में 'सिद्धांत शिरोमणि', जिसका एक भाग 'लीलावती' अंकगणित की लोकप्रिय पाठ्यपुस्तक बना।
इनके बारे में और पढ़ें: प्राचीन भारत के विद्वान।
आधुनिक भारत के वैज्ञानिक
- प्रफुल्ल चंद्र राय (1861 से 1944): रसायनज्ञ; 1896 में मर्क्यूरस नाइट्राइट पर शोध और 1901 में बंगाल केमिकल्स की स्थापना, जो भारत की शुरुआती दवा कंपनियों में थी।
- चंद्रशेखर वेंकट रमन (1888 से 1970): 28 फ़रवरी 1928 को प्रकाश के प्रकीर्णन में 'रमन प्रभाव' की खोज की घोषणा की और 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार पाया। इसी खोज की याद में 28 फ़रवरी राष्ट्रीय विज्ञान दिवस है।
- मेघनाद साहा (1893 से 1956): 1920 में तारों के तापमान और उनके स्पेक्ट्रम को जोड़ने वाला आयनीकरण समीकरण दिया, जिसे साहा समीकरण कहते हैं।
- सत्येंद्र नाथ बोस (1894 से 1974): 1924 में प्रकाश के कणों की गिनती का नया तरीक़ा दिया, जिसे आइंस्टीन ने आगे बढ़ाया; 'बोसॉन' कण उन्हीं के नाम पर हैं।
- जानकी अम्माल (1897 से 1984): वनस्पति वैज्ञानिक; गन्ने की संकर किस्मों और पौधों के गुणसूत्रों पर काम किया।
- आसिमा चटर्जी (1917 से 2006): रसायनज्ञ; औषधीय पौधों के यौगिकों पर शोध, और 1944 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से विज्ञान में डॉक्टरेट पाने वाली पहली महिला।
- विक्रम साराभाई (1919 से 1971): भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक; 1969 में इसरो बना, और 1975 का पहला उपग्रह 'आर्यभट' उन्हीं के शुरू किए कार्यक्रम का नतीजा था।
- ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (1931 से 2015): 1980 में रोहिणी उपग्रह को कक्षा में पहुँचाने वाले SLV-3 के परियोजना निदेशक; बाद में 2002 से 2007 तक राष्ट्रपति।
एक नज़र में: समयरेखा
| समय | वैज्ञानिक | काम |
|---|---|---|
| पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व से | सुश्रुत संहिता | शल्य चिकित्सा, नाक की पुनर्रचना |
| 499 ईस्वी | आर्यभट | आर्यभटीय, π ≈ 3.1416 |
| 628 ईस्वी | ब्रह्मगुप्त | शून्य के गणितीय नियम |
| 1150 | भास्कर द्वितीय | सिद्धांत शिरोमणि, लीलावती |
| 1894 से 1896 | जगदीश चंद्र बसु | मिलीमीटर रेडियो तरंगें |
| 1913 से 1920 | रामानुजन | विभाजन, श्रेणियाँ, मॉक थीटा फ़ंक्शन |
| 1920 | मेघनाद साहा | आयनीकरण समीकरण |
| 1924 | सत्येंद्र नाथ बोस | बोस सांख्यिकी |
| 1928 | सी. वी. रमन | रमन प्रभाव (नोबेल 1930) |
| 1975 | इसरो | पहला उपग्रह आर्यभट |
प्रोजेक्ट के लिए सुझाव और आवाज़ में बातचीत
किसी वैज्ञानिक पर प्रोजेक्ट बनाते समय तीन बातें लिखें: उन्होंने ठीक ठीक क्या खोजा, किस ग्रंथ या शोध पत्र में, और उस समय दूसरे लोग क्या कर रहे थे। 'भारत ने सबसे पहले' जैसे दावे तभी लिखें जब स्रोत यह साफ़ कहता हो।
आप Yuga ऐप में आर्यभट, सुश्रुत, रामानुजन या जगदीश चंद्र बसु के AI रूप से आवाज़ में सवाल पूछकर इंटरव्यू का अभ्यास कर सकते हैं। ये उनके ग्रंथों और इतिहास पर बने AI पुनर्निर्माण हैं, असली लोग नहीं, और ये गलती कर सकते हैं; सुश्रुत से कोई चिकित्सा सलाह न लें, और प्रोजेक्ट में मूल स्रोतों का हवाला दें। दुनिया के दूसरे वैज्ञानिकों के लिए देखें विश्व के महान वैज्ञानिक।
लोग क्या पूछते हैं
- भारत के सबसे प्रसिद्ध प्राचीन वैज्ञानिक कौन थे?
- प्राचीन भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों और विद्वानों में आर्यभट (गणित और खगोल, 499 ईस्वी), ब्रह्मगुप्त (शून्य के नियम, 628 ईस्वी), वराहमिहिर, भास्कर द्वितीय, और चिकित्सा में सुश्रुत व चरक के नाम आते हैं। सुश्रुत और चरक के ग्रंथ कई सदियों में परतों में बने, इसलिए उनकी तारीख़ें अनुमानित हैं।
- भारत का पहला नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक कौन था?
- विज्ञान में नोबेल पाने वाले पहले भारतीय चंद्रशेखर वेंकट रमन थे, जिन्हें 1930 में प्रकाश के प्रकीर्णन से जुड़े 'रमन प्रभाव' के लिए भौतिकी का नोबेल मिला। इससे पहले 1913 में रवीन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल मिला था। रमन प्रभाव की घोषणा की तारीख़ 28 फ़रवरी राष्ट्रीय विज्ञान दिवस है।
- क्या जगदीश चंद्र बसु ने रेडियो का आविष्कार किया?
- नहीं, पूरी तरह नहीं। बसु ने 1894 से 1896 के बीच मिलीमीटर रेडियो तरंगें बनाईं, पकड़ीं और उनके गुणों का अध्ययन किया, और गैलेना क्रिस्टल डिटेक्टर बनाया। संदेश भेजने वाली रेडियो प्रणाली का विकास और पेटेंट मार्कोनी ने किया। बसु का काम वैज्ञानिक अध्ययन था।
- सुश्रुत को प्लास्टिक सर्जरी का जनक क्यों कहते हैं?
- 'सुश्रुत संहिता' में गाल की त्वचा के टुकड़े से कटी नाक को फिर बनाने की विस्तृत विधि है, जो आज की पुनर्रचनात्मक सर्जरी जैसी है। इसलिए उन्हें यह उपाधि दी जाती है। पर ग्रंथ कई सदियों में बना, और 'जनक' कहना एक लोकप्रिय उपाधि है, इतिहास का मापा हुआ निष्कर्ष नहीं।
स्रोत
- The Aryabhatiya of Aryabhata, translated by Walter Eugene Clark (1930)
- Kaviraj Kunja Lal Bhishagratna, An English Translation of the Sushruta Samhita, 3 vols (1907 to 1916)
- J. C. Bose, Response in the Living and Non-Living (1902), Project Gutenberg
- The Nobel Prize in Physics 1930, NobelPrize.org
- Kim Plofker, Mathematics in India (2009)
- Dominik Wujastyk, The Roots of Ayurveda: Selections from Sanskrit Medical Writings (1998)