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श्रीनिवास रामानुजन का जीवन परिचय

7 मिनट

श्रीनिवास रामानुजन (22 दिसंबर 1887 से 26 अप्रैल 1920) तमिलनाडु के लगभग स्वयं शिक्षित गणितज्ञ थे। उन्होंने अनंत श्रेणियों, सतत भिन्नों, संख्याओं के विभाजन और मॉड्यूलर फ़ंक्शन पर हज़ारों परिणाम अपनी नोटबुकों में लिखे। 1913 में कैम्ब्रिज के जी. एच. हार्डी को लिखे पत्र के बाद वे इंग्लैंड गए, 1918 में रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो बने और 32 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।

रामानुजन के जीवन की मुख्य तिथियाँ

तिथिघटना
22 दिसंबर 1887तमिलनाडु के इरोड में ननिहाल में जन्म; बचपन कुंभकोणम में
1903जी. एस. कार की किताब 'A Synopsis of Elementary Results in Pure and Applied Mathematics' हाथ लगी
1904 से 1907कॉलेज में गणित के अलावा विषयों में फ़ेल; छात्रवृत्ति छूटी
1909जानकी अम्माल से विवाह (वे तब बच्ची थीं, साथ रहना कुछ साल बाद शुरू हुआ)
1911जर्नल ऑफ़ द इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी में पहला शोध पत्र, बर्नूली संख्याओं पर
1912मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी
16 जनवरी 1913कैम्ब्रिज के जी. एच. हार्डी को परिणामों से भरा पत्र
मार्च 1914इंग्लैंड के लिए रवाना; ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज पहुँचे
मार्च 1916शोध के आधार पर बी.ए. की डिग्री ('Highly composite numbers' पर)
1918रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो चुने गए; अक्टूबर में ट्रिनिटी कॉलेज के फ़ेलो
1919बीमारी की हालत में भारत लौटे
26 अप्रैल 1920कुंभकोणम में 32 वर्ष की उम्र में निधन

बचपन: एक किताब जिसने रास्ता बदल दिया

रामानुजन का परिवार तमिल ब्राह्मण था और आर्थिक रूप से साधारण था। पिता के. श्रीनिवास अय्यंगार कुंभकोणम में एक कपड़े की दुकान में मुनीम थे और माँ कोमलताम्मल घर पर रहती थीं। स्कूल में वे गणित में बहुत आगे थे।

लगभग 15 साल की उम्र में उन्हें जी. एस. कार की किताब 'Synopsis' मिली, जिसमें लगभग 5,000 परिणाम बिना पूरे प्रमाणों के, छोटे छोटे रूप में लिखे थे। जीवनी लेखक रॉबर्ट कनिगेल के अनुसार इसी किताब की शैली ने रामानुजन के काम करने का ढंग बनाया: वे परिणाम लिखते थे, लंबे प्रमाण नहीं।

कॉलेज में वे गणित में इतने डूबे रहे कि बाक़ी विषयों में फ़ेल हो गए और छात्रवृत्ति छूट गई। कुछ साल वे बिना नौकरी के रहे और स्लेट पर हिसाब करके परिणाम नोटबुकों में उतारते रहे। ये नोटबुकें आज गणित के इतिहास की सबसे अध्ययन की गई पांडुलिपियों में हैं।

हार्डी को 1913 का पत्र

1912 में उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी मिली, जहाँ के अधिकारी उनकी प्रतिभा पहचानते थे। 16 जनवरी 1913 को उन्होंने कैम्ब्रिज के गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को पत्र लिखा, जिसके साथ कई पन्नों में प्रमेय भेजे। पत्र की शुरुआत ऐसे होती है:

“मैं आपसे अपना परिचय मद्रास के पोर्ट ट्रस्ट कार्यालय के लेखा विभाग में एक क्लर्क के रूप में कराना चाहता हूँ।”
जी. एच. हार्डी को पत्र, 16 जनवरी 1913 (Berndt और Rankin, Ramanujan: Letters and Commentary, 1995 में प्रकाशित). मूल अंग्रेज़ी: “I beg to introduce myself to you as a clerk in the Accounts Department of the Port Trust Office at Madras”

उसी पत्र में उन्होंने लिखा कि स्कूल छोड़ने के बाद वे अपना ख़ाली समय गणित में लगा रहे थे। हार्डी और उनके साथी जे. ई. लिटलवुड ने प्रमेयों को देखा। कुछ पहले से ज्ञात थे, एक दावा (अभाज्य संख्याओं की गिनती का) ग़लत निकला, पर बहुत से परिणाम नए और गहरे थे। हार्डी ने उन्हें कैम्ब्रिज बुलाने की व्यवस्था की।

कैम्ब्रिज के पाँच साल: क्या खोजा

मार्च 1914 में रामानुजन इंग्लैंड गए। धार्मिक कारणों से समुद्र पार करने में परिवार को झिझक थी, पर अंत में वे गए। 1927 में छपे उनके 'Collected Papers' में 37 शोध पत्र हैं, जिनमें से ज़्यादातर कैम्ब्रिज के वर्षों के हैं और कुछ हार्डी के साथ लिखे गए। कुछ प्रमुख काम:

  • विभाजन (partitions): किसी संख्या को धनात्मक पूर्णांकों के योग के रूप में कितने तरीक़ों से लिखा जा सकता है। उदाहरण: 4 को 5 तरीक़ों से लिख सकते हैं (4, 3+1, 2+2, 2+1+1, 1+1+1+1)। हार्डी और रामानुजन ने 1918 में इसके लिए एक आश्चर्यजनक रूप से सटीक सूत्र दिया।
  • विभाजन संख्याओं के 5, 7 और 11 से जुड़े नियम, जैसे यह कि p(5n+4) हमेशा 5 से विभाज्य होता है (1919)।
  • 'Highly composite numbers' (1915): ऐसी संख्याएँ जिनके भाजक अपने से छोटी हर संख्या से ज़्यादा हों।
  • π के लिए तेज़ी से पास पहुँचने वाली श्रेणियाँ (1914), जिनके रूप आज भी कंप्यूटर गणना में इस्तेमाल होते हैं।
  • जीवन के अंतिम महीनों में 'मॉक थीटा फ़ंक्शन', जिनका वर्णन उन्होंने जनवरी 1920 में हार्डी को लिखे अंतिम पत्र में किया।

मार्च 1916 में उन्हें शोध के आधार पर बी.ए. की डिग्री मिली, जिसे बाद में पीएचडी कहा जाने लगा। 1918 में वे रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो चुने गए, ऐसा सम्मान पाने वाले दूसरे भारतीय, और उसी साल ट्रिनिटी कॉलेज के फ़ेलो बनने वाले पहले भारतीय।

1729 की कहानी और रामानुजन का धार्मिक विश्वास

इंग्लैंड में ठंड, युद्ध के समय की कमियाँ और शाकाहारी भोजन की कठिनाई ने उनकी सेहत बिगाड़ दी। 1917 से वे लंबे समय तक बीमार रहे। उस समय तपेदिक माना गया; बाद के कुछ डॉक्टरों ने लक्षणों के आधार पर लिवर के अमीबिक संक्रमण की संभावना बताई है।

इसी बीमारी के दौरान का एक प्रसंग हार्डी ने ख़ुद लिखा है। वे पटनी के अस्पताल में रामानुजन से मिलने गए और बताया कि वे टैक्सी नंबर 1729 में आए, जो उन्हें एक नीरस संख्या लगी। रामानुजन ने तुरंत कहा कि यह बहुत रोचक संख्या है: यह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो घनों के योग के रूप में दो अलग तरीक़ों से लिखा जा सकता है। यानी 1729 = 1³ + 12³ = 9³ + 10³। इसीलिए 1729 को हार्डी रामानुजन संख्या कहते हैं।

रामानुजन अपनी कुलदेवी नामगिरी के प्रति श्रद्धा रखते थे। उनके एक मित्र के हवाले से उनका यह कथन प्रसिद्ध है कि कोई समीकरण तब तक उनके लिए अर्थहीन है जब तक वह ईश्वर का कोई विचार व्यक्त न करे। यह बात बाद की जीवनियों में मित्र की याद के रूप में दर्ज है, उनके किसी लेख में नहीं।

निधन, खोई नोटबुक और विरासत

1919 में वे भारत लौटे और 26 अप्रैल 1920 को कुंभकोणम में उनका निधन हो गया। 1976 में गणितज्ञ जॉर्ज एंड्रूज़ को ट्रिनिटी कॉलेज के पुस्तकालय में उनके अंतिम वर्ष के पन्नों का एक बंडल मिला, जिसे 'खोई हुई नोटबुक' कहा गया। इसके परिणामों पर दशकों तक काम चला, और ब्रूस बर्न्ड्ट व एंड्रूज़ ने इन्हें कई खंडों में संपादित किया।

भारत सरकार ने 2011 के अंत में घोषणा की कि उनका जन्मदिन 22 दिसंबर हर साल राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाएगा, और 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया। उस दिन के लिए गतिविधियाँ और भाषण के बिंदु यहाँ हैं: राष्ट्रीय गणित दिवस और रामानुजन।

अगर आप उनसे उनकी नोटबुकों या 1729 के बारे में पूछना चाहते हैं, तो Yuga ऐप में रामानुजन के AI रूप से आवाज़ में बात कर सकते हैं। यह उनके पत्रों, शोध पत्रों और जीवनियों पर बना AI पुनर्निर्माण है, असली रामानुजन नहीं, और यह गणित या तथ्यों में गलती कर सकता है; सूत्रों को हमेशा प्रकाशित स्रोतों से मिलाएँ। दूसरे भारतीय वैज्ञानिकों के लिए पढ़ें भारत के महान वैज्ञानिक।

लोग क्या पूछते हैं

श्रीनिवास रामानुजन का जन्म कब और कहाँ हुआ?
रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में उनके ननिहाल में हुआ था। उनका बचपन कुंभकोणम में बीता, जहाँ उनके पिता एक कपड़े की दुकान में मुनीम थे। उनका जन्मदिन अब भारत में राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है।
1729 को रामानुजन संख्या क्यों कहते हैं?
जी. एच. हार्डी ने लिखा है कि वे टैक्सी नंबर 1729 से रामानुजन से मिलने गए और इसे नीरस संख्या कहा। रामानुजन ने बताया कि यह सबसे छोटी संख्या है जो दो घनों के योग के रूप में दो तरह से लिखी जा सकती है: 1³ + 12³ और 9³ + 10³। इसी किस्से से इसे हार्डी रामानुजन संख्या कहा जाता है।
रामानुजन की मृत्यु कैसे हुई?
इंग्लैंड में रहते हुए 1917 से रामानुजन लंबे समय तक बीमार रहे। 1919 में वे भारत लौटे और 26 अप्रैल 1920 को 32 वर्ष की उम्र में कुंभकोणम में उनका निधन हुआ। उस समय बीमारी को तपेदिक माना गया था; बाद में कुछ डॉक्टरों ने लिवर के अमीबिक संक्रमण की संभावना बताई है, पर पक्का निदान संभव नहीं है।
रामानुजन ने गणित में क्या योगदान दिया?
रामानुजन ने संख्याओं के विभाजन, अनंत श्रेणियों, सतत भिन्नों, π की श्रेणियों, highly composite numbers और मॉक थीटा फ़ंक्शन पर काम किया। हार्डी के साथ उन्होंने विभाजन संख्या का सटीक अनुमान देने वाला सूत्र खोजा। उनकी नोटबुकों के हज़ारों परिणामों पर गणितज्ञ आज भी काम कर रहे हैं।
क्या रामानुजन ने कोई डिग्री ली थी?
भारत में वे कॉलेज की परीक्षाएँ पास नहीं कर पाए, क्योंकि गणित के अलावा विषयों में फ़ेल हो गए थे। कैम्ब्रिज में मार्च 1916 में उन्हें 'Highly composite numbers' पर शोध के आधार पर बी.ए. की डिग्री मिली, जिसे बाद में पीएचडी के बराबर माना गया।

स्रोत

  • Bruce C. Berndt and Robert A. Rankin, Ramanujan: Letters and Commentary (1995)
  • G. H. Hardy, P. V. Seshu Aiyar and B. M. Wilson (eds.), Collected Papers of Srinivasa Ramanujan (1927)
  • G. H. Hardy, Ramanujan: Twelve Lectures on Subjects Suggested by His Life and Work (1940)
  • Robert Kanigel, The Man Who Knew Infinity: A Life of the Genius Ramanujan (1991)
  • George E. Andrews and Bruce C. Berndt, Ramanujan's Lost Notebook, Part I (2005)