आर्यभट का गणित और खगोल विज्ञान में योगदान
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आर्यभट (जन्म 476 ईस्वी) प्राचीन भारत के गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। उन्होंने 499 ईस्वी में कुसुमपुर (आम तौर पर पाटलिपुत्र, आज का पटना) में 'आर्यभटीय' नाम का संस्कृत ग्रंथ लिखा। इसमें दशमलव स्थानीय मान पर आधारित गणना, π का मान लगभग 3.1416 (जिसे उन्होंने ख़ुद 'आसन्न' यानी लगभग कहा), ज्या की तालिका, ग्रहणों की छाया से व्याख्या और पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का विचार है। 1975 में भारत का पहला उपग्रह उन्हीं के नाम पर रखा गया।
आर्यभट कौन थे: जो पक्का पता है और जो नहीं
आर्यभट के जीवन के बारे में लगभग सारी पक्की जानकारी उनके अपने ग्रंथ से आती है। 'आर्यभटीय' के कालक्रियापाद में वे लिखते हैं कि जब कलियुग के 3,600 वर्ष बीत चुके थे, तब वे 23 वर्ष के थे। इस गणना से वह वर्ष 499 ईस्वी बनता है, इसलिए उनका जन्म 476 ईस्वी माना जाता है। ग्रंथ में वे कुसुमपुर में पूजित ज्ञान का उल्लेख करते हैं, जिसे ज़्यादातर विद्वान पाटलिपुत्र मानते हैं।
उनका जन्मस्थान पक्का नहीं है। बाद के एक टीकाकार ने उन्हें 'अश्मक' से जोड़ा, और केरल व बिहार दोनों में उन्हें अपना बताने की परंपराएँ हैं। उनकी मृत्यु की तारीख़ भी ज्ञात नहीं; अनुमान लगभग 550 ईस्वी का है। निबंध में ये बातें 'माना जाता है' कहकर लिखें।
मुख्य तिथियाँ और नाम
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 476 ईस्वी | आर्यभट का जन्म (उनके अपने कथन से निकाला गया वर्ष) |
| 499 ईस्वी | कुसुमपुर में 'आर्यभटीय' की रचना |
| 628 ईस्वी | ब्रह्मगुप्त ने 'ब्रह्मस्फुटसिद्धांत' में उनके कई मतों की आलोचना की |
| 629 ईस्वी | भास्कर प्रथम ने 'आर्यभटीय' पर टीका लिखी |
| 1930 | वॉल्टर यूजीन क्लार्क का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित |
| 1976 | के. एस. शुक्ल और के. वी. शर्मा का आलोचनात्मक संस्करण |
| 19 अप्रैल 1975 | भारत का पहला उपग्रह 'आर्यभट' सोवियत रॉकेट से प्रक्षेपित |
आर्यभटीय में क्या है: चार भाग, 121 श्लोक
'आर्यभटीय' छोटा पर घना ग्रंथ है। यह पद्य में है ताकि याद रखा जा सके, और इसके चार भाग हैं:
- गीतिकापाद (13 श्लोक): बड़ी संख्याएँ लिखने की उनकी अक्षर आधारित पद्धति, ग्रहों के चक्र और ज्या की तालिका।
- गणितपाद (33 श्लोक): वर्गमूल, घनमूल, क्षेत्रफल, आयतन, श्रेढ़ियाँ, π का मान और कुट्टक विधि।
- कालक्रियापाद (25 श्लोक): समय की इकाइयाँ, युग और ग्रहों की गति।
- गोलपाद (50 श्लोक): आकाश का गोल, पृथ्वी का घूमना, दिन रात और ग्रहण।
श्लोक बहुत संक्षिप्त हैं, इसलिए उन्हें समझने के लिए भास्कर प्रथम (629 ईस्वी) जैसे टीकाकारों की व्याख्या की मदद ली जाती है।
π का मान 3.1416: श्लोक और उसका अर्थ
गणितपाद के दसवें श्लोक में आर्यभट वृत्त की परिधि का मान देते हैं:
“चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्। अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥”
अर्थ: 100 में 4 जोड़ो, 8 से गुणा करो, फिर 62,000 जोड़ो। यह 20,000 व्यास वाले वृत्त की लगभग परिधि है। हिसाब लगाएँ: (100 + 4) × 8 + 62,000 = 62,832। परिधि को व्यास से भाग दें: 62,832 ÷ 20,000 = 3.1416।
सबसे ध्यान देने वाला शब्द 'आसन्न' है, यानी 'निकट' या 'लगभग'। आर्यभट ख़ुद कह रहे हैं कि यह सटीक मान नहीं, एक निकट मान है। आज हम जानते हैं कि π का दशमलव रूप कभी ख़त्म नहीं होता; कुछ विद्वान मानते हैं कि 'आसन्न' शब्द इसी समझ की ओर इशारा करता है, पर यह व्याख्या है, ग्रंथ में स्पष्ट रूप से नहीं लिखा।
स्थानीय मान और शून्य: आर्यभट ने क्या किया और क्या नहीं
अक्सर कहा जाता है कि 'आर्यभट ने शून्य का आविष्कार किया'। यह सटीक नहीं है। आर्यभट की गणनाएँ, जैसे वर्गमूल और घनमूल निकालने की विधियाँ, दशमलव स्थानीय मान पद्धति पर टिकी हैं, जिसमें किसी अंक का मान उसके स्थान से तय होता है। उन्होंने कहा कि हर स्थान पिछले से दस गुना है। पर 'आर्यभटीय' में शून्य के लिए कोई अलग चिह्न या शून्य के साथ गणित के नियम नहीं दिए गए हैं।
शून्य को एक संख्या मानकर उसके जोड़, घटाव और गुणा के नियम पहली बार स्पष्ट रूप से ब्रह्मगुप्त ने 628 ईस्वी के 'ब्रह्मस्फुटसिद्धांत' में दिए। इसलिए सही वाक्य यह है: आर्यभट का काम स्थानीय मान पद्धति पर टिका था, और शून्य के गणितीय नियम बाद में ब्रह्मगुप्त ने लिखे।
पृथ्वी का घूमना, ग्रहण और समय की गणना
गोलपाद के नौवें श्लोक में आर्यभट नाव का उदाहरण देते हैं: जैसे आगे बढ़ती नाव में बैठा व्यक्ति किनारे की स्थिर चीज़ों को पीछे जाता देखता है, वैसे ही स्थिर तारे पश्चिम की ओर जाते दिखते हैं। उनका तर्क था कि तारे नहीं घूम रहे, पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम रही है। उस समय के ज़्यादातर खगोलशास्त्री इससे सहमत नहीं थे, और बाद के कुछ टीकाकारों ने इस विचार को बदलकर पढ़ा।
ध्यान दें: आर्यभट ने पृथ्वी को घूमता हुआ माना, पर सूर्य को केंद्र में रखने वाला मॉडल नहीं दिया। उनके मॉडल में पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में है। इसलिए उन्हें कोपरनिकस से पहले 'सूर्य केंद्रित सिद्धांत' देने वाला कहना ग़लत है।
ग्रहणों के बारे में उन्होंने लिखा कि चंद्रमा सूर्य को ढकता है और पृथ्वी की बड़ी छाया चंद्रमा को ढकती है (गोलपाद, श्लोक 37 से 48)। यानी ग्रहण का कारण छाया है, राहु नाम का दानव नहीं। उन्होंने ग्रहण का समय और आकार निकालने की विधियाँ भी दीं।
उन्होंने पृथ्वी के एक नाक्षत्र घूर्णन का समय लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4.1 सेकंड दिया, जो आधुनिक मान के बहुत निकट है। उन्होंने चंद्रमा और ग्रहों के चमकने का कारण सूर्य का परावर्तित प्रकाश बताया। ज्या (sine) के 24 मानों की तालिका और कुट्टक विधि, यानी ax + c = by जैसे अनिर्धारित समीकरण हल करने का तरीक़ा, भी उनके ग्रंथ में है।
आर्यभट की विरासत और आगे क्या पढ़ें
आर्यभट के बाद भारत के खगोलशास्त्रियों में 'आर्य पक्ष' नाम की परंपरा चली, ख़ासकर दक्षिण भारत और केरल में। ब्रह्मगुप्त जैसे विद्वानों ने उनकी आलोचना भी की, जैसे युग को चार बराबर भागों में बाँटने के उनके तरीक़े की। यह बहस अपने आप में दिखाती है कि उस समय गणित और खगोल पर गंभीर चर्चा होती थी।
19 अप्रैल 1975 को इसरो का बनाया भारत का पहला उपग्रह 'आर्यभट' सोवियत संघ से प्रक्षेपित हुआ। इसकी तस्वीर 1976 के दो रुपये के नोट पर भी छपी थी।
अगर आप आर्यभट से पूछना चाहते हैं कि उन्होंने 'आसन्न' शब्द क्यों लिखा, तो Yuga ऐप में आर्यभट के AI रूप से आवाज़ में बात कर सकते हैं। यह 'आर्यभटीय' और विद्वानों के अध्ययन पर बना एक AI पुनर्निर्माण है, असली आर्यभट नहीं, और यह गलत भी हो सकता है; स्कूल के काम में ग्रंथ और नीचे दिए स्रोतों का हवाला दें। दूसरे भारतीय वैज्ञानिकों के लिए देखें भारत के महान वैज्ञानिक और प्राचीन भारत के विद्वान।
लोग क्या पूछते हैं
- आर्यभट ने आर्यभटीय कब लिखा?
- आर्यभट ने 'आर्यभटीय' 499 ईस्वी में कुसुमपुर में लिखा, जिसे ज़्यादातर विद्वान पाटलिपुत्र (आज का पटना) मानते हैं। यह तारीख़ उनके अपने श्लोक से निकलती है, जिसमें वे कहते हैं कि कलियुग के 3,600 वर्ष बीतने पर वे 23 वर्ष के थे। ग्रंथ में चार भागों में 121 श्लोक हैं।
- क्या आर्यभट ने शून्य की खोज की थी?
- नहीं, यह आम ग़लतफ़हमी है। आर्यभट की गणनाएँ दशमलव स्थानीय मान पद्धति पर टिकी थीं, पर 'आर्यभटीय' में शून्य का अलग चिह्न या शून्य के साथ गणित के नियम नहीं हैं। शून्य को संख्या मानकर उसके नियम पहली बार स्पष्ट रूप से ब्रह्मगुप्त ने 628 ईस्वी में लिखे।
- आर्यभट ने π का मान कितना बताया?
- आर्यभट ने गणितपाद के दसवें श्लोक में 20,000 व्यास वाले वृत्त की परिधि 62,832 बताई, जिससे π लगभग 3.1416 आता है। उन्होंने इसे 'आसन्न', यानी लगभग मान कहा। यह मान चार दशमलव स्थानों तक सही है।
- भारत का पहला उपग्रह आर्यभट कब छोड़ा गया?
- भारत का पहला उपग्रह 'आर्यभट' 19 अप्रैल 1975 को सोवियत संघ के कापुस्तिन यार से सोवियत रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित किया गया। इसे इसरो ने बनाया था और इसका नाम प्राचीन गणितज्ञ आर्यभट के सम्मान में रखा गया।
- क्या आर्यभट ने कहा था कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है?
- नहीं। आर्यभट ने कहा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे तारे पश्चिम की ओर जाते दिखते हैं, और इसके लिए नाव का उदाहरण दिया। पर उनके मॉडल में पृथ्वी केंद्र में थी; उन्होंने सूर्य केंद्रित मॉडल नहीं दिया।
स्रोत
- The Aryabhatiya of Aryabhata, English translation by Walter Eugene Clark (1930), Internet Archive
- K. S. Shukla and K. V. Sarma, Aryabhatiya of Aryabhata, critical edition and translation (1976)
- Kim Plofker, Mathematics in India (2009)
- Bibhutibhushan Datta and Avadhesh Narayan Singh, History of Hindu Mathematics (1935)