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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जीवन परिचय

7 मिनट

रानी लक्ष्मीबाई (जन्म नाम मणिकर्णिका) झाँसी की मराठा रानी थीं। उनका जन्म वाराणसी में हुआ; परंपरा 19 नवंबर 1828 बताती है, पर कुछ विद्वान 1835 मानते हैं। 1854 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके दत्तक पुत्र को मान्यता न देकर झाँसी हड़प ली। 1857 के विद्रोह में उन्होंने मार्च 1858 में अंग्रेज़ सेना से झाँसी की रक्षा की, फिर कालपी और ग्वालियर में लड़ीं और जून 1858 में ग्वालियर के पास युद्ध में मारी गईं।

रानी लक्ष्मीबाई के जीवन की मुख्य तिथियाँ

तिथिघटना
19 नवंबर 1828 (परंपरा); कुछ विद्वान 1835वाराणसी में जन्म, नाम मणिकर्णिका, घर का नाम मनु
1842झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से विवाह; नाम लक्ष्मीबाई
1851पुत्र का जन्म, जिसकी कुछ महीनों में मृत्यु
नवंबर 1853दामोदर राव को गोद लिया; अगले दिन गंगाधर राव का निधन
मार्च 1854कंपनी ने 'व्यपगत का सिद्धांत' लगाकर झाँसी को अपने राज्य में मिलाया
जून 1857झाँसी में सिपाहियों का विद्रोह; अंग्रेज़ अधिकारियों और परिवारों की हत्या
1857 से 1858रानी ने झाँसी का शासन संभाला
23 मार्च 1858सर ह्यू रोज़ की सेना ने झाँसी की घेराबंदी शुरू की
3 और 4 अप्रैल 1858झाँसी पर हमला; रानी रात में दामोदर राव के साथ निकलकर कालपी पहुँचीं
1 जून 1858तात्या टोपे और राव साहब के साथ ग्वालियर पर क़ब्ज़ा
17 या 18 जून 1858ग्वालियर के पास कोटा की सराय में युद्ध में मृत्यु

बचपन: मणिकर्णिका से 'मनु' तक

मणिकर्णिका का जन्म वाराणसी में मोरोपंत तांबे और भागीरथी बाई के घर हुआ। जन्म का साल पक्का नहीं है: परंपरा और ज़्यादातर पाठ्यपुस्तकें 19 नवंबर 1828 लिखती हैं, जबकि कुछ इतिहासकार 1835 के आसपास का साल मानते हैं। निबंध में यह मतभेद एक वाक्य में लिख देना सबसे सही है।

माँ की मृत्यु के बाद वे पिता के साथ बिठूर में रहीं, जहाँ उनके पिता अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार से जुड़े थे। जीवनियों के अनुसार वहीं उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और निशानेबाज़ी सीखी और पढ़ना लिखना भी। बचपन के कई किस्से बाद की कहानियों से आए हैं, इसलिए उन्हें कथा की तरह ही पढ़ें।

झाँसी का विलय: व्यपगत का सिद्धांत क्या था

1842 में उनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ और उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 1851 में उनके बेटे का जन्म हुआ, पर वह कुछ ही महीनों में चल बसा। नवंबर 1853 में राजा ने एक रिश्तेदार के बच्चे आनंद राव को गोद लिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा गया, और अगले दिन राजा का निधन हो गया।

गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी की नीति थी कि जिस राजा का अपना पुत्र न हो, उसके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी न मानकर राज्य कंपनी में मिला लिया जाए। इसे व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse) कहा गया। मार्च 1854 में झाँसी को इसी आधार पर हड़प लिया गया। रानी को पेंशन दी गई और क़िला छोड़कर शहर के महल में रहना पड़ा।

रानी ने इसका क़ानूनी विरोध किया। उन्होंने आवेदन भेजे कि हिंदू क़ानून और पुरानी संधियों के अनुसार गोद लेना वैध है, और ऑस्ट्रेलियाई वकील जॉन लैंग को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया। लैंग ने 1854 की इस मुलाक़ात का वर्णन अपनी किताब 'Wanderings in India' (1859) में किया है, जो रानी का सबसे नज़दीकी आँखों देखा विवरण है। लोकप्रिय वाक्य 'मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी' परंपरा से जुड़ा है; किसी समकालीन दस्तावेज़ में यह शब्दशः नहीं मिलता।

1857 में झाँसी: क्या हुआ और किस पर बहस है

जून 1857 में झाँसी में तैनात सिपाहियों ने विद्रोह किया और 8 जून को अंग्रेज़ अधिकारियों, स्त्रियों और बच्चों समेत कई लोगों की हत्या कर दी गई। इसमें रानी की भूमिका पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। रानी ने सागर के अंग्रेज़ कमिश्नर मेजर अर्स्किन को पत्र लिखकर कहा कि विद्रोही सिपाहियों ने उन्हें मजबूर किया था और हत्याएँ उनके आदेश से नहीं हुईं। अंग्रेज़ों ने बाद में उन्हें ही ज़िम्मेदार माना।

इसके बाद कई महीनों तक रानी ने झाँसी का शासन चलाया, सेना जुटाई और पड़ोसी रियासतों के हमलों से झाँसी की रक्षा की। उनकी सेना में हिंदू और मुसलमान दोनों थे; तोपख़ाने के प्रमुख ग़ौस ख़ाँ का नाम इसमें ख़ास तौर पर लिया जाता है।

झाँसी की घेराबंदी, कालपी और ग्वालियर

23 मार्च 1858 को सर ह्यू रोज़ की सेंट्रल इंडिया फ़ील्ड फ़ोर्स ने झाँसी को घेर लिया। रानी ने आत्मसमर्पण से इनकार किया और क़िले की रक्षा का संगठन किया। मराठी यात्री विष्णुभट गोडसे, जो उस समय झाँसी में थे, अपनी किताब 'माझा प्रवास' में लिखते हैं कि स्त्रियाँ भी परकोटे तक गोला बारूद और पानी पहुँचाती थीं। 1 अप्रैल को तात्या टोपे की राहत सेना बेतवा के पास हार गई।

3 और 4 अप्रैल को अंग्रेज़ सेना शहर में घुसी और भारी लूट और हत्याएँ हुईं। 4 अप्रैल की रात रानी दामोदर राव के साथ कुछ साथियों सहित क़िले से निकलीं और लगभग 100 मील दूर कालपी पहुँचीं। झलकारी बाई के बारे में परंपरा कहती है कि उन्होंने रानी का वेश धरकर अंग्रेज़ों को भ्रम में डाला; यह लोक परंपरा है और इसके ब्योरे दस्तावेज़ों से पक्के नहीं हैं।

कालपी भी मई 1858 में हार गया। तब रानी, तात्या टोपे और राव साहब ने 1 जून 1858 को ग्वालियर पर क़ब्ज़ा कर लिया ताकि विद्रोहियों को एक मज़बूत ठिकाना मिले। ह्यू रोज़ की सेना ग्वालियर पहुँची और 17 जून 1858 को कोटा की सराय के पास लड़ाई में रानी घायल होकर मारी गईं। कुछ स्रोत 18 जून बताते हैं। उनका अंतिम संस्कार पास ही किया गया, जहाँ आज ग्वालियर में उनकी समाधि है।

लोकप्रिय चित्रों में रानी को पीठ पर बेटे को बाँधकर घोड़े पर लड़ते दिखाया जाता है। यह छवि बहुत प्रसिद्ध है, पर समकालीन स्रोतों में इसका पक्का प्रमाण नहीं मिलता, इसलिए इसे परंपरा की छवि के रूप में ही लिखें।

रानी लक्ष्मीबाई को आज कैसे याद किया जाता है

सुभद्रा कुमारी चौहान की 1930 की कविता 'झाँसी की रानी' ने उन्हें हिंदी भाषी घरों में सबसे जानी पहचानी नायिका बना दिया, और यही कविता आज भी स्कूलों में पढ़ाई जाती है। इतिहासकार हरलीन सिंह की किताब 'The Rani of Jhansi: Gender, History, and Fable in India' (2014) बताती है कि उनकी छवि समय के साथ कैसे बदली।

उनकी जयंती पर भाषण चाहिए तो पढ़ें रानी लक्ष्मीबाई जयंती पर भाषण। इतिहास की दूसरी रानियों के लिए देखें भारत की महान रानियाँ।

अगर आप प्रोजेक्ट के लिए उनसे सवाल पूछना चाहते हैं, तो Yuga ऐप में रानी लक्ष्मीबाई के AI रूप से आवाज़ में बात कर सकते हैं, जैसे 'आपने झाँसी के विलय का विरोध कैसे किया?'। यह इतिहास के रिकॉर्ड पर बना एक AI पुनर्निर्माण है, असली रानी नहीं, और यह गलत भी हो सकता है; स्कूल के काम में लैंग, गोडसे और ऊपर दी गई किताबों का हवाला दें।

लोग क्या पूछते हैं

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म कब हुआ था?
परंपरा और ज़्यादातर पाठ्यपुस्तकों के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। कुछ इतिहासकार उनका जन्म वर्ष 1835 के आसपास मानते हैं, क्योंकि समकालीन दस्तावेज़ों में उनकी उम्र अलग अलग लिखी गई है। जन्म का नाम मणिकर्णिका था और घर में उन्हें मनु कहते थे।
रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु कब और कहाँ हुई?
रानी लक्ष्मीबाई 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में अंग्रेज़ घुड़सवार सेना से लड़ते हुए घायल होकर मारी गईं। कुछ स्रोत 18 जून की तारीख़ देते हैं। उनका अंतिम संस्कार पास ही हुआ और ग्वालियर में उनकी समाधि है।
व्यपगत का सिद्धांत क्या था और झाँसी पर कैसे लागू हुआ?
यह लॉर्ड डलहौज़ी की नीति थी, जिसके तहत जिस राजा का अपना पुत्र न हो, उसके दत्तक पुत्र को वारिस न मानकर राज्य कंपनी के अधीन कर लिया जाता था। गंगाधर राव ने मरने से एक दिन पहले दामोदर राव को गोद लिया था, पर कंपनी ने इसे नहीं माना और मार्च 1854 में झाँसी को अपने राज्य में मिला लिया।
क्या 'मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी' रानी के असली शब्द हैं?
यह वाक्य परंपरा और लोकप्रिय कहानियों से आया है। रानी के समय के किसी दस्तावेज़ में ये शब्द शब्दशः नहीं मिलते। इतना पक्का है कि उन्होंने 1854 में झाँसी के विलय के ख़िलाफ़ औपचारिक आवेदन भेजे और वकील जॉन लैंग के ज़रिए अपना पक्ष रखा। निबंध में इसे 'परंपरा के अनुसार' लिखें।

स्रोत

  • John Lang, Wanderings in India and Other Sketches of Life in Hindostan (1859)
  • विष्णुभट गोडसे, माझा प्रवास (1907; अंग्रेज़ी अनुवाद 1957)
  • Joyce Lebra-Chaudhuri, The Rani of Jhansi: A Study in Female Heroism in India (1986)
  • Harleen Singh, The Rani of Jhansi: Gender, History, and Fable in India (2014)
  • Surendra Nath Sen, Eighteen Fifty-Seven (1957)