शहीद भगत सिंह का जीवन परिचय
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भगत सिंह (28 सितंबर 1907 से 23 मार्च 1931) पंजाब के क्रांतिकारी और विचारक थे। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्य थे। दिसंबर 1928 में लाहौर में पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स की हत्या और 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम फेंककर गिरफ़्तारी देने के बाद उन्होंने अदालत और जेल को अपने विचारों का मंच बनाया। 23 वर्ष की उम्र में उन्हें लाहौर जेल में फाँसी दी गई।
भगत सिंह के जीवन की मुख्य तिथियाँ
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 28 सितंबर 1907 | पंजाब के लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव में जन्म (अब पाकिस्तान में); कुछ स्रोत 27 सितंबर लिखते हैं |
| 13 अप्रैल 1919 | जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड, तब वे 11 वर्ष के थे |
| 1921 से 1923 | लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ाई |
| 1926 | नौजवान भारत सभा की स्थापना में भूमिका |
| सितंबर 1928 | दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला में HSRA का गठन |
| 17 नवंबर 1928 | साइमन कमीशन विरोध में लाठीचार्ज के बाद लाला लाजपत राय का निधन |
| 17 दिसंबर 1928 | लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक जे. पी. सॉन्डर्स की हत्या |
| 8 अप्रैल 1929 | बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय असेंबली में बम और पर्चे फेंके, गिरफ़्तारी दी |
| जून 1929 | असेंबली केस में उम्रक़ैद; जेल में भूख हड़ताल शुरू |
| 13 सितंबर 1929 | 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद साथी जतींद्रनाथ दास की मृत्यु |
| 5 और 6 अक्टूबर 1930 | जेल में 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' लिखा |
| 7 अक्टूबर 1930 | लाहौर षड्यंत्र केस में विशेष ट्रिब्यूनल ने मौत की सज़ा सुनाई |
| 23 मार्च 1931 | राजगुरु और सुखदेव के साथ लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी |
बचपन और परिवार: राजनीति घर में ही थी
भगत सिंह का जन्म एक सिख परिवार में हुआ जो पहले से अंग्रेज़ी राज के विरोध में सक्रिय था। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह दोनों आंदोलनों में जेल जा चुके थे; अजीत सिंह 1907 के किसान आंदोलन के बाद देश से बाहर चले गए थे। माँ का नाम विद्यावती था।
1919 के जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड का उन पर गहरा असर पड़ा। किशोर उम्र में वे ग़दर पार्टी के युवा शहीद करतार सिंह सराभा को अपना आदर्श मानते थे, जिन्हें 1915 में फाँसी हुई थी। 1920 के असहयोग आंदोलन के समय उन्होंने सरकारी स्कूल छोड़ा और लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाख़िला लिया, जहाँ इतिहास, राजनीति और यूरोप की क्रांतियों पर ख़ूब पढ़ा।
जीवनियों के अनुसार घर वालों ने शादी तय की तो वे लाहौर छोड़कर कानपुर चले गए और वहाँ पत्रकारिता की। वे हिंदी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेज़ी में लिखते थे, और 'कीर्ति' जैसी पत्रिकाओं में उनके लेख छपे।
नौजवान भारत सभा से HSRA तक
1926 में उन्होंने साथियों के साथ लाहौर में नौजवान भारत सभा बनाई, जिसका मक़सद युवाओं और किसानों मज़दूरों में राजनीतिक चेतना फैलाना था। सितंबर 1928 में दिल्ली में क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया। नाम में 'सोशलिस्ट' जुड़ना भगत सिंह और उनके साथियों के बदलते विचारों का संकेत था। चंद्रशेखर आज़ाद इसके सैन्य प्रमुख थे।
30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में जुलूस पर लाठीचार्ज हुआ, जिसमें लाला लाजपत राय घायल हुए और 17 नवंबर को उनका निधन हो गया। बदले के लिए क्रांतिकारियों ने पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई, पर 17 दिसंबर 1928 को ग़लत पहचान के कारण सहायक अधीक्षक जे. पी. सॉन्डर्स को गोली मारी गई। पीछा करने वाले हेड कांस्टेबल चानन सिंह भी मारे गए। यह राजनीतिक हिंसा थी और इतिहासकार आज भी इस पर बहस करते हैं; भगत सिंह ने बाद में अपने लेखों में व्यक्तिगत हिंसा की सीमाओं पर लिखा।
असेंबली बम कांड: गिरफ़्तारी क्यों दी
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधान सभा में दो बम फेंके, जब पब्लिक सेफ़्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल पर कार्यवाही चल रही थी। बम खाली जगह पर फेंके गए ताकि कोई मारा न जाए, और कुछ लोग ही मामूली घायल हुए। दोनों ने 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के नारे लगाए, HSRA के पर्चे फेंके और भागने के बजाय गिरफ़्तारी दी।
पर्चे की पहली पंक्ति थी कि बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ की ज़रूरत होती है। उनका इरादा मुक़दमे को अपने विचार देश तक पहुँचाने का मंच बनाना था। 6 जून 1929 को अदालत में दिए बयान में उन्होंने क्रांति का अर्थ समझाया। इन दस्तावेज़ों के शब्दशः अंश भगत सिंह के विचार में पढ़ें।
जून 1929 में दोनों को असेंबली केस में उम्रक़ैद हुई। इसके बाद सॉन्डर्स हत्या का मामला, जिसे लाहौर षड्यंत्र केस कहा गया, उन पर चला।
जेल, भूख हड़ताल और फाँसी
जेल में भगत सिंह और साथियों ने राजनीतिक क़ैदियों के लिए बेहतर खाना, किताबें और अख़बार जैसी माँगों पर लंबी भूख हड़ताल की। साथी जतींद्रनाथ दास की 63 दिन की हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को मृत्यु हुई, जिससे पूरे देश में ग़ुस्सा फैला।
1930 में सरकार ने अध्यादेश से विशेष ट्रिब्यूनल बनाया, जिसके फ़ैसले के ख़िलाफ़ आम अपील का रास्ता नहीं था। भगत सिंह ने कई बार अदालत में आने से इनकार किया। 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को मौत की सज़ा सुनाई गई। फाँसी रुकवाने के लिए देश भर में अपीलें हुईं, पर सज़ा नहीं बदली गई।
20 मार्च 1931 को उन्होंने पंजाब के गवर्नर को पत्र लिखा कि उन्हें युद्धबंदी मानकर फाँसी के बजाय गोली से उड़ाया जाए। 23 मार्च 1931 की शाम लाहौर सेंट्रल जेल में तीनों को फाँसी दी गई, जो तय तारीख़ से एक दिन पहले थी। शवों का अंतिम संस्कार चुपचाप फ़िरोज़पुर के पास हुसैनीवाला में सतलुज किनारे किया गया, जहाँ आज राष्ट्रीय शहीद स्मारक है।
भगत सिंह ने क्या लिखा: पढ़ने लायक मूल रचनाएँ
भगत सिंह को सिर्फ़ उनके साहस से याद करना अधूरा है; वे 23 साल की उम्र तक बहुत कुछ पढ़ और लिख चुके थे। ये रचनाएँ आज हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में आसानी से मिलती हैं:
- 'सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज' (कीर्ति, 1928): दंगों के लिए नेताओं, अख़बारों और धार्मिक कट्टरता को ज़िम्मेदार ठहराया।
- 'अछूत का सवाल' (कीर्ति, 1928): छुआछूत ख़त्म करने और दलितों के अपने संगठन की बात।
- असेंबली का पर्चा (8 अप्रैल 1929) और अदालत में बयान (6 जून 1929)।
- 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' (5 और 6 अक्टूबर 1930, लाहौर जेल)।
- 'नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम' (2 फ़रवरी 1931)।
- जेल नोटबुक: इसमें उन्होंने दूसरी किताबों से उद्धरण उतारे थे, इसलिए इसकी हर पंक्ति उनकी अपनी नहीं है।
अपने इंटरव्यू या प्रोजेक्ट की तैयारी के लिए आप Yuga ऐप में भगत सिंह से आवाज़ में बात कर सकते हैं और उनसे पूछ सकते हैं कि वे नास्तिक क्यों बने। यह उनके लेखों और इतिहास के रिकॉर्ड से बना AI पुनर्निर्माण है, असली भगत सिंह नहीं, और यह गलती कर सकता है। स्कूल के काम में ऊपर दी गई मूल रचनाओं का हवाला दें।
भगत सिंह की विरासत: क्यों आज भी पढ़े जाते हैं
23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को याद किया जाता है। 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' का नारा, जो उर्दू शायर हसरत मोहानी से जुड़ा है, उनकी वजह से देश भर में फैला।
आज कई विचारधाराएँ भगत सिंह को अपना बताती हैं। उन्हें समझने का सबसे भरोसेमंद रास्ता उनकी अपनी रचनाएँ हैं, जिनमें वे समाजवाद, तर्क, जाति और सांप्रदायिकता पर साफ़ लिखते हैं। उनके दौर के दूसरे क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ें स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी में।
लोग क्या पूछते हैं
- भगत सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
- भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के फ़ैसलाबाद ज़िले में है। कुछ स्रोत 27 सितंबर की तारीख़ देते हैं। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे।
- भगत सिंह को फाँसी कब और क्यों दी गई?
- भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी दी गई। उन्हें लाहौर षड्यंत्र केस में, यानी दिसंबर 1928 में पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स की हत्या के मामले में, एक विशेष ट्रिब्यूनल ने 7 अक्टूबर 1930 को मौत की सज़ा सुनाई थी। तब उनकी उम्र 23 साल थी।
- भगत सिंह ने असेंबली में बम क्यों फेंका?
- 8 अप्रैल 1929 को उन्होंने और बटुकेश्वर दत्त ने पब्लिक सेफ़्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के विरोध में असेंबली में बम फेंके। बम किसी को मारने के लिए नहीं थे; उन्हें खाली जगह फेंका गया। मक़सद गिरफ़्तारी देकर मुक़दमे के ज़रिए अपने विचार देश तक पहुँचाना था, जैसा उनके पर्चे और अदालत के बयान में लिखा है।
- क्या भगत सिंह नास्तिक थे?
- हाँ। अक्टूबर 1930 में लाहौर जेल में उन्होंने 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' निबंध लिखा। उसमें वे बताते हैं कि वे घमंड के कारण नहीं, बल्कि पढ़ने और तर्क करने के बाद ईश्वर में विश्वास छोड़ चुके थे, और मौत सामने होने पर भी उस विश्वास का सहारा नहीं लेना चाहते थे।
- भगत सिंह के साथ किन्हें फाँसी हुई?
- भगत सिंह के साथ शिवराम हरि राजगुरु और सुखदेव थापर को 23 मार्च 1931 को लाहौर में फाँसी दी गई। राजगुरु सॉन्डर्स वाली घटना में उनके साथ थे और सुखदेव पंजाब में संगठन के प्रमुख सदस्य थे। तीनों की याद में 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है।
स्रोत
- Bhagat Singh, Why I am an Atheist (5 and 6 October 1930), Marxists Internet Archive
- Bhagat Singh Internet Archive: पर्चे, अदालत के बयान और पत्र (1923 से 1931)
- S. Irfan Habib, To Make the Deaf Hear: Ideology and Programme of Bhagat Singh and His Comrades (2007)
- Chaman Lal, Understanding Bhagat Singh (2013)
- A. G. Noorani, The Trial of Bhagat Singh: Politics of Justice (1996)