भगत सिंह के विचार, उनके अपने शब्दों में
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भगत सिंह के विचार उनके अपने दस्तावेज़ों में मिलते हैं: 8 अप्रैल 1929 का असेंबली वाला पर्चा, 6 जून 1929 का अदालत में बयान, अक्टूबर 1930 में जेल में लिखा 'मैं नास्तिक क्यों हूँ', और 1931 का 'नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम'। इनमें वे कहते हैं कि क्रांति का मतलब बम और पिस्तौल नहीं, अन्याय पर टिकी व्यवस्था को बदलना है, और तर्क व आलोचना हर क्रांतिकारी के लिए ज़रूरी है।
पहले यह जानें: इंटरनेट के 'भगत सिंह कोट्स' कितने असली हैं
भगत सिंह के नाम से सोशल मीडिया पर सैकड़ों पंक्तियाँ घूमती हैं। उनमें से कई उनके किसी लेख में नहीं मिलतीं, और कुछ उनकी जेल नोटबुक से ली गई हैं, जिसमें उन्होंने दूसरे लेखकों के उद्धरण अपने हाथ से उतारे थे। इसलिए किसी पंक्ति को उनका कहने से पहले देखें कि वह किस दस्तावेज़ में है और किस तारीख़ का है।
नीचे दिए सभी उद्धरण उनके प्रकाशित दस्तावेज़ों से हैं। मूल पाठ अंग्रेज़ी में उपलब्ध है, इसलिए हर उद्धरण का हिंदी अनुवाद दिया है और स्रोत में मूल अंग्रेज़ी शब्द भी, ताकि आप ख़ुद मिला सकें। ये दस्तावेज़ Marxists Internet Archive पर मुफ़्त पढ़े जा सकते हैं।
| दस्तावेज़ | तारीख़ | किस बारे में |
|---|---|---|
| 'सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज' | 1928, कीर्ति पत्रिका | दंगों के कारण और वर्ग चेतना |
| 'अछूत का सवाल' | 1928, कीर्ति पत्रिका | छुआछूत और बराबरी |
| सुखदेव को पत्र | 5 अप्रैल 1929 | जीवन, प्रेम और त्याग |
| असेंबली का पर्चा | 8 अप्रैल 1929 | बम फेंकने का कारण |
| अदालत में बयान (बटुकेश्वर दत्त के साथ) | 6 जून 1929 | क्रांति का अर्थ |
| 'मॉडर्न रिव्यू' के संपादक को जवाब | दिसंबर 1929 | 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' का अर्थ |
| 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' | 5 और 6 अक्टूबर 1930 | ईश्वर, तर्क और विश्वास |
| 'नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम' | 2 फ़रवरी 1931 | समाजवाद और संगठन |
| पंजाब के गवर्नर को पत्र | 20 मार्च 1931 | फाँसी के बजाय गोली की माँग |
क्रांति पर: बम और पिस्तौल नहीं, व्यवस्था में बदलाव
असेंबली में फेंके गए HSRA के पर्चे की शुरुआत फ़्रांसीसी अराजकतावादी वैलां के शब्दों से होती है। भगत सिंह और साथियों ने इन्हें अपने काम की वजह के रूप में रखा।
“बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ की ज़रूरत होती है।”
उसी पर्चे में आगे लिखा है कि व्यक्तियों को मारना आसान है, पर विचारों को नहीं मारा जा सकता। दो महीने बाद अदालत में उनसे पूछा गया कि 'क्रांति' से उनका क्या मतलब है। उनका जवाब इस विषय पर उनका सबसे साफ़ कथन है:
“क्रांति के लिए खूनी लड़ाई अनिवार्य नहीं है, और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय है कि अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था बदलनी चाहिए।”
इसी बयान में वे किसानों, बुनकरों और मज़दूरों का उदाहरण देते हैं, जो सबके लिए अनाज, कपड़ा और महल बनाते हैं पर ख़ुद भूखे और बेघर रहते हैं। बयान का अंत इन पंक्तियों से होता है कि क्रांति मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है, स्वतंत्रता सबका अधिकार है और श्रम ही समाज को चलाता है (मूल: “Revolution is an inalienable right of mankind. Freedom is an imperishable birth right of all. Labour is the real sustainer of society.”)।
दिसंबर 1929 में 'मॉडर्न रिव्यू' के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय ने 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के नारे को अर्थहीन बताया। भगत सिंह ने जवाब में लिखा कि यह नारा बदलाव की भावना के लिए है, और कि 'विद्रोह क्रांति नहीं है' (मूल: “A rebellion is not a revolution.”)। यह जवाब 24 दिसंबर 1929 को 'द ट्रिब्यून' में छपा।
तर्क और ईश्वर पर: 'मैं नास्तिक क्यों हूँ'
अक्टूबर 1930 में, मौत की सज़ा सुनाए जाने के आसपास, लाहौर जेल में भगत सिंह ने यह लंबा निबंध लिखा। उनके एक साथी ने कहा था कि वे घमंड के कारण नास्तिक हैं। निबंध इसी आरोप का जवाब है। वे बताते हैं कि बचपन में वे धार्मिक थे और पढ़ने व सोचने से धीरे धीरे उनका विश्वास बदला। निबंध पहली बार 1931 में उनकी मृत्यु के बाद लाहौर के अख़बार 'द पीपल' में छपा।
“जो भी व्यक्ति प्रगति के पक्ष में खड़ा है, उसे पुराने विश्वास की हर बात की आलोचना करनी होगी, उस पर अविश्वास करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी।”
“आलोचना और स्वतंत्र चिंतन, ये दो एक क्रांतिकारी के अनिवार्य गुण हैं।”
निबंध में वे यह भी लिखते हैं कि वे यथार्थवादी हैं और अपने भीतर की आदतों को तर्क की मदद से जीतने की कोशिश करते हैं। ध्यान दें कि वे धार्मिक लोगों का मज़ाक नहीं उड़ाते; वे यह समझाते हैं कि उनके लिए तर्क से परखा गया विश्वास ही स्वीकार करने लायक है।
जाति, धर्म और समाज पर
1928 में 'कीर्ति' पत्रिका में छपे लेख 'सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज' में उन्होंने दंगों के लिए नेताओं, अख़बारों और धार्मिक कट्टरता को ज़िम्मेदार बताया। उनके अनुसार इलाज यह है कि ग़रीब मज़दूर और किसान समझें कि उनके असली दुश्मन पूँजीपति हैं, और वे धर्म के नाम पर एक दूसरे से न लड़ें।
उसी साल के लेख 'अछूत का सवाल' में उन्होंने लिखा कि अछूत कहे जाने वाले लोगों को बराबर इंसान माना जाए, और कि उन्हें अपने हक़ के लिए ख़ुद संगठित होना चाहिए। ये दोनों लेख मूल रूप से पंजाबी और हिंदी में छपे थे, इसलिए इनके शीर्षक अलग अनुवादों में थोड़े अलग मिलते हैं।
जीवन, त्याग और संगठन पर
भगत सिंह को अक्सर ऐसे युवक के रूप में दिखाया जाता है जो मरने को उत्सुक था। उनके पत्र कुछ और कहते हैं। 5 अप्रैल 1929 को, असेंबली कांड से तीन दिन पहले, उन्होंने साथी सुखदेव को लिखा:
“मैं फिर ज़ोर देकर कहता हूँ कि मैं महत्वाकांक्षा और आशा से भरा हूँ, और जीवन के पूरे आकर्षण से भी। पर ज़रूरत के समय मैं सब कुछ त्याग सकता हूँ, और यही असली त्याग है।”
फाँसी से सात हफ़्ते पहले, 2 फ़रवरी 1931 को लिखे 'नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम' में वे युवाओं को भावुक बलिदान के बजाय लंबे, धैर्य वाले काम की सलाह देते हैं: किसानों और मज़दूरों के बीच जाना, उन्हें संगठित करना, और समाजवादी व्यवस्था का लक्ष्य रखना। वे लिखते हैं कि इस काम में भावना या मृत्यु नहीं, बल्कि लगातार संघर्ष, कष्ट और त्याग का जीवन चाहिए (मूल: “It requires neither the emotion nor the death, but the life of constant struggle, suffering and sacrifice.”)।
20 मार्च 1931 को पंजाब के गवर्नर को लिखे पत्र में उन्होंने और साथियों ने माँग की कि उन्हें युद्धबंदी माना जाए और फाँसी के बजाय गोली मारी जाए।
इन विचारों को अपने निबंध या भाषण में कैसे इस्तेमाल करें
- हर उद्धरण के साथ दस्तावेज़ और तारीख़ लिखें, जैसे: 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' (अक्टूबर 1930)।
- अनुवाद हो तो लिखें कि यह अनुवाद है; मूल शब्द ऊपर के स्रोतों में दिए हैं।
- विचारों को उनके समय में रखें: 1929 का बयान मुक़दमे के दौरान दिया गया था, और 1931 का पत्र फाँसी से पहले।
- उनकी हिंसा पर इतिहासकारों में बहस है। निबंध में सॉन्डर्स की हत्या का तथ्य छिपाएँ नहीं, और बताएँ कि बाद में उन्होंने व्यक्तिगत हिंसा पर क्या लिखा।
अगर आप उनसे बहस करके देखना चाहते हैं कि वे अपने तर्क कैसे रखते, तो Yuga ऐप में भगत सिंह के AI रूप से आवाज़ में बात कर सकते हैं। यह उनके लेखों पर बना एक AI पुनर्निर्माण है, असली व्यक्ति नहीं, और कभी गलत भी हो सकता है; उद्धरण हमेशा मूल दस्तावेज़ से ही लें। उनकी पूरी कहानी के लिए पढ़ें भगत सिंह की जीवनी।
लोग क्या पूछते हैं
- 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' कब लिखा गया?
- भगत सिंह ने यह निबंध 5 और 6 अक्टूबर 1930 को लाहौर सेंट्रल जेल में लिखा, लगभग उसी समय जब उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई। यह उनकी फाँसी के बाद 1931 में लाहौर के अख़बार 'द पीपल' में छपा। इसमें वे बताते हैं कि वे घमंड के कारण नहीं, तर्क और अध्ययन से नास्तिक बने।
- क्या 'बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़' भगत सिंह का कथन है?
- यह पंक्ति 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में फेंके गए HSRA के पर्चे की शुरुआत में है, इसलिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के काम से सीधे जुड़ी है। पर्चा ख़ुद बताता है कि ये शब्द मूल रूप से फ़्रांसीसी अराजकतावादी वैलां के थे, जिन्हें उन्होंने अपनाया।
- 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' का नारा किसने दिया?
- यह नारा उर्दू शायर हसरत मोहानी से जोड़ा जाता है, जिन्होंने इसे 1920 के दशक की शुरुआत में इस्तेमाल किया। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में और फिर अदालत में यह नारा लगाया, जिससे यह पूरे देश में फैल गया। दिसंबर 1929 में भगत सिंह ने एक पत्र में इसका अर्थ भी समझाया।
- भगत सिंह क्रांति का क्या मतलब समझते थे?
- 6 जून 1929 को अदालत में उन्होंने कहा कि क्रांति के लिए खूनी लड़ाई ज़रूरी नहीं और यह बम व पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है। उनके लिए क्रांति का मतलब था अन्याय पर टिकी व्यवस्था को बदलना, ताकि किसान और मज़दूर अपनी मेहनत का फल पा सकें। 1931 में उन्होंने इसे समाजवादी व्यवस्था के लक्ष्य से जोड़ा।
स्रोत
- Bhagat Singh Internet Archive: पर्चा (8 April 1929), Statement (6 June 1929), To Young Political Workers (1931)
- Bhagat Singh, Why I am an Atheist (1930), Marxists Internet Archive
- Why I am an Atheist, Wikisource
- S. Irfan Habib, To Make the Deaf Hear: Ideology and Programme of Bhagat Singh and His Comrades (2007)
- Chaman Lal (ed.), The Bhagat Singh Reader (2019) और Understanding Bhagat Singh (2013)