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सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन परिचय

7 मिनट

सरदार वल्लभभाई पटेल (31 अक्टूबर 1875 से 15 दिसंबर 1950) गुजरात के वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने 1918 में खेड़ा और 1928 में बारडोली के किसान आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिसके बाद उन्हें 'सरदार' कहा गया। आज़ाद भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में उन्होंने 500 से अधिक रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराया और अखिल भारतीय सेवाओं की नींव मज़बूत की।

मुख्य तिथियाँ एक नज़र में

वर्षघटना
31 अक्टूबर 1875नडियाद, गुजरात में ननिहाल में जन्म; पिता झवेरभाई, माता लाडबा; परिवार का गाँव करमसद
1897लगभग 22 वर्ष की उम्र में मैट्रिक पास
1900 के आसपासगोधरा और फिर बोरसद में ज़िला वकील के रूप में वकालत
1909पत्नी झवेरबा का निधन
1910 से 1913लंदन के मिडिल टेंपल में क़ानून की पढ़ाई; बैरिस्टर बनकर अहमदाबाद लौटे
1917अहमदाबाद नगरपालिका में चुने गए; गुजरात सभा में सक्रिय
1918खेड़ा सत्याग्रह
1928बारडोली सत्याग्रह; 'सरदार' कहे जाने लगे
1931कराची कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष
1942 से 1945भारत छोड़ो आंदोलन के समय गिरफ़्तार, अहमदनगर क़िले में बंद
1947 से 1950उप प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और रियासत मंत्री
15 दिसंबर 1950बंबई में निधन
1991मरणोपरांत भारत रत्न

बचपन और पढ़ाई: देर से मैट्रिक, फिर लंदन

वल्लभभाई का परिवार खेड़ा ज़िले के करमसद गाँव का किसान परिवार था। उनका जन्म नडियाद में ननिहाल में हुआ। स्कूल की पढ़ाई में कई रुकावटें आईं और उन्होंने लगभग 22 साल की उम्र में मैट्रिक पास किया। उसके बाद उन्होंने ज़िला वकील की परीक्षा दी और गोधरा व बोरसद में फ़ौजदारी मुकदमों के वकील के रूप में नाम कमाया।

उनका सपना इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बनने का था। जीवनियों में बताया जाता है कि पहली बार उनके नाम का पासपोर्ट और टिकट आया तो बड़े भाई विट्ठलभाई ने पहले जाने की इच्छा जताई, और वल्लभभाई ने उन्हें जाने दिया। 1909 में उनकी पत्नी झवेरबा का बंबई में ऑपरेशन के बाद निधन हुआ। उनके दो बच्चे थे, मणिबेन और डाह्याभाई। 1910 में वे लंदन गए, मिडिल टेंपल में पढ़े और 1913 में बैरिस्टर बनकर अहमदाबाद लौटे।

खेड़ा और बारडोली: किसानों के नेता कैसे बने

1917 के बाद पटेल अहमदाबाद की राजनीति और फिर राष्ट्रीय आंदोलन में आ गए। उन्होंने अपनी चलती हुई वकालत छोड़ दी और विदेशी कपड़ों की जगह खादी अपनाई।

1918 में खेड़ा ज़िले में फ़सल ख़राब होने के बावजूद सरकार पूरा लगान वसूल रही थी। पटेल गाँव गाँव घूमकर किसानों को संगठित करने वालों में थे। किसानों ने लगान रोक दिया और अंत में सरकार को ग़रीब किसानों से वसूली में ढील देनी पड़ी।

1928 का बारडोली सत्याग्रह पूरी तरह उनके नेतृत्व में चला। सरकार ने बारडोली तालुका में लगान लगभग 22 प्रतिशत बढ़ा दिया था। पटेल ने गाँवों को छावनियों में बाँटा, स्वयंसेवक तैनात किए और किसानों से वादा लिया कि वे न लगान देंगे, न हिंसा करेंगे। ज़मीनें और मवेशी ज़ब्त होने पर भी आंदोलन टिका रहा। आख़िर में सरकार ने जाँच समिति बैठाई और बढ़ोतरी काफ़ी कम कर दी गई। इसी आंदोलन के बाद लोग उन्हें 'सरदार' कहने लगे; परंपरा के अनुसार यह नाम बारडोली की महिलाओं ने दिया।

1931 में वे कराची कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष बने, जहाँ मौलिक अधिकारों और आर्थिक नीति पर प्रस्ताव पास हुआ। 1930 के दशक में वे कांग्रेस के संगठन को चलाने वाले मुख्य नेताओं में गिने जाते थे। अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होते ही उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और वे लगभग तीन साल अहमदनगर क़िले में रहे।

रियासतों का विलय: सबसे बड़ा काम

15 अगस्त 1947 को पटेल देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने। 5 जुलाई 1947 को बने रियासत विभाग का काम भी उन्हीं के पास था और उसके सचिव वी. पी. मेनन थे। उसी दिन जारी अपने बयान में पटेल ने राजाओं से अपील की कि वे साथी भारतीय के नाते रक्षा, विदेश मामले और संचार भारत को सौंपकर संघ में शामिल हों, और साथ में यह भी साफ़ किया कि अलग रहना व्यावहारिक नहीं होगा।

इस 'विलय पत्र' के रास्ते से ज़्यादातर रियासतें 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारत में आ गईं। बाद के वर्षों में छोटी रियासतों को मिलाकर नए राज्य बनाए गए, जैसे सौराष्ट्र और राजस्थान, और राजाओं को निजी भत्ता (प्रिवी पर्स) दिया गया।

तीन मामले कठिन रहे। जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान चुना, पर 20 फ़रवरी 1948 के जनमत संग्रह में जनता ने भारत चुना। हैदराबाद के निज़ाम स्वतंत्र रहना चाहते थे; सितंबर 1948 की सैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन पोलो) के बाद हैदराबाद भारत में आया। इस कार्रवाई के दौरान और बाद में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिसमें बहुत से मुसलमान मारे गए, और इसकी जाँच रिपोर्ट दशकों तक सार्वजनिक नहीं हुई। कश्मीर का मामला अलग ढंग से चला और उस पर इतिहासकारों में आज भी बहस है।

संविधान सभा और प्रशासनिक सेवाएँ

संविधान सभा में पटेल मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय क्षेत्रों पर बनी सलाहकार समिति के अध्यक्ष थे। इस समिति ने 1949 में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटें हटाकर सबके लिए साझा निर्वाचन का रास्ता चुना।

10 अक्टूबर 1949 को उन्होंने संविधान सभा में अखिल भारतीय सेवाओं का ज़ोरदार बचाव किया। उनका तर्क था कि पूरे देश में काम करने वाली, राजनीति से स्वतंत्र प्रशासनिक सेवा के बिना देश एक नहीं रह पाएगा। 21 अप्रैल 1947 को उन्होंने दिल्ली के मेटकाफ़ हाउस में प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित किया था, और इसी तारीख़ को आज सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है।

पटेल के उद्धरण के नाम पर इंटरनेट पर बहुत सी पंक्तियाँ मिलती हैं जिनका कोई स्रोत नहीं होता। उनके असली विचार पढ़ने हों तो बारडोली के भाषण (1928), कराची अध्यक्षीय भाषण (1931) और संविधान सभा की बहसें (1946 से 1949) देखें।

निधन और विरासत: आज उन्हें कैसे याद किया जाता है

15 दिसंबर 1950 को बंबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ। 1991 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया। 2014 से उनकी जयंती 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है और 2018 में गुजरात में उनकी 182 मीटर ऊँची प्रतिमा, स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी, बनी।

उनकी विरासत पर अलग अलग राजनीतिक दल दावा करते हैं, इसलिए स्कूल के निबंध में बेहतर है कि आप ठोस कामों पर टिके रहें: किसान आंदोलन, रियासतों का विलय, और प्रशासनिक ढाँचा। एकता दिवस के लिए तैयार भाषण चाहिए तो देखें राष्ट्रीय एकता दिवस पर सरदार पटेल भाषण।

अगर आप इंटरव्यू प्रोजेक्ट कर रहे हैं, तो Yuga ऐप में सरदार पटेल के AI रूप से आवाज़ में बात करके सवाल पूछने का अभ्यास कर सकते हैं, जैसे 'बारडोली में किसानों को एकजुट कैसे रखा?'। यह उनके भाषणों और इतिहास के रिकॉर्ड पर बना AI पुनर्निर्माण है, असली व्यक्ति नहीं, और गलत भी हो सकता है; अपने काम में किताबों और मूल दस्तावेज़ों का हवाला दें। कैसे सवाल बनाएँ, इसके लिए देखें इतिहास के व्यक्ति से इंटरव्यू प्रोजेक्ट।

लोग क्या पूछते हैं

सरदार पटेल का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था, जहाँ उनका ननिहाल था। उनका पैतृक गाँव करमसद था, जो खेड़ा ज़िले में है। उनके पिता झवेरभाई किसान थे और माता का नाम लाडबा था। उनकी जयंती अब राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाई जाती है।
सरदार पटेल को लौह पुरुष क्यों कहा जाता है?
आज़ादी के बाद गृह मंत्री के रूप में उन्होंने 500 से अधिक रियासतों को भारत में शामिल कराने का कठिन काम दृढ़ता से पूरा किया, जिनमें जूनागढ़ और हैदराबाद जैसे विवादित मामले भी थे। बातचीत में नरमी और फ़ैसले में सख़्ती के इसी मेल के कारण उन्हें 'भारत का लौह पुरुष' कहा जाने लगा।
बारडोली सत्याग्रह क्या था?
1928 में गुजरात के बारडोली तालुका में सरकार ने लगान लगभग 22 प्रतिशत बढ़ा दिया। वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में किसानों ने अहिंसक ढंग से लगान देना बंद किया और ज़मीन व मवेशी ज़ब्त होने पर भी डटे रहे। सरकार को जाँच बैठानी पड़ी और बढ़ोतरी घटाई गई। इसी के बाद उन्हें 'सरदार' कहा जाने लगा।
सरदार पटेल का निधन कब हुआ?
सरदार पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 को बंबई (अब मुंबई) में दिल का दौरा पड़ने से हुआ। तब वे 75 वर्ष के थे और देश के उप प्रधानमंत्री व गृह मंत्री थे। 1991 में उन्हें मरणोपरांत देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया।
सरदार पटेल पर निबंध में क्या ज़रूर लिखें?
निबंध में चार बातें ज़रूर रखें: जन्म और पढ़ाई (1875, नडियाद, लंदन से बैरिस्टरी), किसान आंदोलन (खेड़ा 1918, बारडोली 1928), रियासतों का विलय (1947 से 1949, जूनागढ़ और हैदराबाद), और अखिल भारतीय सेवाओं का समर्थन। हर बात के साथ एक तारीख़ दें और बिना स्रोत वाले उद्धरणों से बचें।

स्रोत

  • V. P. Menon, The Story of the Integration of the Indian States (1956)
  • Constituent Assembly of India Debates, 1946 to 1949 (पटेल के भाषण, विशेषकर 10 अक्टूबर 1949)
  • Balraj Krishna, Sardar Vallabhbhai Patel: India's Iron Man (1995)
  • Patel: A Life (1990), सरदार पटेल की प्रमुख अंग्रेज़ी जीवनी
  • Sardar Patel's Correspondence, 1945 to 1950, ed. Durga Das (1971 to 1974)