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सावित्रीबाई फुले का जीवन परिचय

6 मिनट

सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831 से 10 मार्च 1897) महाराष्ट्र की शिक्षिका, कवयित्री और समाज सुधारक थीं। पति जोतीराव फुले के साथ उन्होंने जनवरी 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में लड़कियों का स्कूल खोला, बाद में दलित बच्चों के स्कूल, 1863 में गर्भवती विधवाओं के लिए आश्रय, और सत्यशोधक समाज में काम किया। 1897 में प्लेग के रोगियों की सेवा करते हुए उनका निधन हुआ।

सावित्रीबाई फुले के जीवन की मुख्य तिथियाँ

तिथिघटना
3 जनवरी 1831सतारा ज़िले के नायगाँव में जन्म; पिता खंडोजी नेवसे पाटिल, माता लक्ष्मीबाई
लगभग 1840नौ साल की उम्र में 13 वर्षीय जोतीराव फुले से विवाह
1840 का दशकजोतीराव से घर पर पढ़ना सीखा; बाद में अहमदनगर और पुणे में शिक्षक प्रशिक्षण
जनवरी 1848पुणे के भिड़े वाड़ा में लड़कियों का स्कूल
1849समाज और परिवार के दबाव में फुले दंपति को घर छोड़ना पड़ा
1854पहला कविता संग्रह 'काव्यफुले'
1863बालहत्या प्रतिबंधक गृह: गर्भवती विधवाओं और नवजातों का आश्रय
24 सितंबर 1873सत्यशोधक समाज की स्थापना
1874एक विधवा के बेटे यशवंत को गोद लिया
28 नवंबर 1890जोतीराव फुले का निधन
1892'बावनकशी सुबोध रत्नाकर' प्रकाशित
10 मार्च 1897प्लेग रोगियों की सेवा के दौरान संक्रमण से पुणे में निधन

बचपन और विवाह: पढ़ना कैसे सीखा

सावित्रीबाई का जन्म माली समुदाय के एक किसान परिवार में हुआ। उस समय लड़कियों को, और ख़ासकर तथाकथित निचली जातियों की लड़कियों को, पढ़ाने का चलन लगभग नहीं था। लगभग नौ साल की उम्र में उनका विवाह जोतीराव फुले से हुआ, जो तब 13 साल के थे।

जोतीराव ने ख़ुद मिशनरी और सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की थी। उन्होंने सावित्रीबाई को घर पर पढ़ाना शुरू किया। बाद में सावित्रीबाई ने अहमदनगर में अमेरिकी मिशनरी सिंथिया फ़रार की संस्था में और पुणे में शिक्षक प्रशिक्षण लिया। यही प्रशिक्षण उन्हें औपचारिक रूप से प्रशिक्षित शुरुआती भारतीय महिला शिक्षिकाओं में गिनाता है।

1848 का कन्या विद्यालय और फ़ातिमा शेख

जनवरी 1848 में जोतीराव और सावित्रीबाई ने पुणे में तात्यासाहेब भिड़े के घर, भिड़े वाड़ा, में लड़कियों का स्कूल शुरू किया। सावित्रीबाई इसकी शिक्षिका थीं। कुछ ही वर्षों में फुले दंपति ने पुणे में कई स्कूल खोले, जिनमें दलित बच्चों के स्कूल भी थे।

उन्हें अक्सर 'भारत की पहली महिला शिक्षिका' कहा जाता है। सटीक रूप से कहें तो वे किसी भारतीय द्वारा चलाए गए लड़कियों के स्कूल की शुरुआती भारतीय शिक्षिकाओं में थीं; मिशनरी संस्थाएँ इससे पहले भी कुछ जगहों पर लड़कियों को पढ़ा रही थीं। इससे उनका काम छोटा नहीं होता, क्योंकि उन्होंने यह काम खुले विरोध के बीच किया।

उनकी जीवनियों में लिखा है कि स्कूल जाते समय लोग उन पर कीचड़ और गोबर फेंकते थे, और वे एक अतिरिक्त साड़ी साथ रखती थीं। यह किस्सा परंपरा से चला आया है; उस समय के दस्तावेज़ों में इसका ब्योरा कम है, इसलिए इसे जीवनी की कथा के रूप में लिखें।

1849 में दबाव के कारण फुले दंपति को जोतीराव के पिता का घर छोड़ना पड़ा। परंपरा के अनुसार तब उस्मान शेख ने उन्हें अपने घर में जगह दी, और उनकी बहन फ़ातिमा शेख ने सावित्रीबाई के साथ पढ़ाया। फ़ातिमा शेख के बारे में समकालीन दस्तावेज़ बहुत कम हैं और इतिहासकार उनकी भूमिका के ब्योरे पर बहस करते हैं, पर उन्हें सावित्रीबाई की सहयोगी के रूप में याद किया जाता है।

विधवाओं का आश्रय, सत्यशोधक समाज और अकाल राहत

उस समय विधवा स्त्रियों का सिर मुंडवाया जाता था और उनका जीवन बहुत कठिन था। अगर कोई विधवा गर्भवती हो जाती, तो बदनामी के डर से कई बार नवजात की हत्या तक हो जाती थी। 1863 में फुले दंपति ने अपने घर में 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' खोला, जहाँ ऐसी स्त्रियाँ चुपचाप प्रसव करा सकती थीं। 1874 में उन्होंने काशीबाई नाम की एक विधवा के बेटे को गोद लिया, जिसका नाम यशवंत रखा गया और जो आगे चलकर डॉक्टर बना।

24 सितंबर 1873 को जोतीराव ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जो पुरोहितों की मध्यस्थता और जाति के ऊँच नीच को नकारता था। सावित्रीबाई इसमें सक्रिय रहीं, ख़ासकर महिलाओं के बीच। उन्होंने बिना पुरोहित के, सादगी से विवाह कराने का काम भी किया।

1876 से 1878 के अकाल में फुले दंपति ने राहत के लिए भोजन केंद्र चलाने में मदद की। 1890 में जोतीराव के निधन के बाद सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज का काम आगे बढ़ाया। परंपरा के अनुसार उन्होंने ख़ुद पति की अंत्येष्टि की रस्म निभाई, जो उस समय बहुत असामान्य था।

कवयित्री सावित्रीबाई: 'काव्यफुले' और 'बावनकशी'

सावित्रीबाई ने मराठी में कविताएँ लिखीं। 1854 के संग्रह 'काव्यफुले' में प्रकृति, समाज और शिक्षा पर कविताएँ हैं। इनमें उन्होंने बार बार दलितों और स्त्रियों से कहा कि अज्ञान ही उनकी ग़ुलामी की जड़ है और शिक्षा से वे उससे निकल सकते हैं। 1892 की 'बावनकशी सुबोध रत्नाकर' में जोतीराव के जीवन और काम का वर्णन है।

जोतीराव को लिखे उनके पत्र भी बचे हैं (1856 और 1868 के)। 1868 के पत्र में उन्होंने बताया कि उनके भाई ने उनके काम की आलोचना की, और उन्होंने अपना काम जारी रखने का निश्चय दोहराया। उनकी सारी रचनाएँ 'सावित्रीबाई फुले समग्र वाङ्मय' (संपादक एम. जी. माली, 1988) में संकलित हैं। उनकी किसी कविता की पंक्ति उद्धृत करनी हो, तो इसी संग्रह से मूल मराठी लें, क्योंकि इंटरनेट पर अनुवाद अलग अलग मिलते हैं।

1897 का प्लेग, निधन और विरासत

1896 और 1897 में पुणे में बूबोनिक प्लेग फैला। सावित्रीबाई और उनके डॉक्टर बेटे यशवंत ने शहर के बाहर रोगियों के लिए क्लिनिक चलाया। जीवनियों के अनुसार वे एक बीमार बच्चे को उठाकर क्लिनिक तक ले गईं और ख़ुद संक्रमित हो गईं। 10 मार्च 1897 को उनका निधन हुआ।

2014 में पुणे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय रखा गया। उनकी जयंती 3 जनवरी को देश भर में मनाई जाती है, और महाराष्ट्र में इस दिन को बालिका दिन के रूप में भी मनाया जाता है। जयंती के लिए तैयार भाषण यहाँ है: सावित्रीबाई फुले जयंती पर भाषण।

स्कूल प्रोजेक्ट के लिए आप Yuga ऐप में सावित्रीबाई फुले से आवाज़ में बात कर सकते हैं और पूछ सकते हैं कि 1848 में लड़कियों को पढ़ाना कैसा था। यह उनकी रचनाओं और इतिहास के रिकॉर्ड पर बना AI पुनर्निर्माण है, असली व्यक्ति नहीं, और इसमें गलती हो सकती है; अपने उत्तरों में किताबों और मूल स्रोतों का हवाला दें। दूसरे सुधारकों के बारे में पढ़ें राजा राम मोहन राय की जीवनी।

लोग क्या पूछते हैं

सावित्रीबाई फुले का जन्म कब और कहाँ हुआ?
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के नायगाँव में हुआ था। उनके पिता खंडोजी नेवसे पाटिल किसान थे। लगभग नौ वर्ष की उम्र में उनका विवाह जोतीराव फुले से हुआ, जिन्होंने उन्हें पढ़ना लिखना सिखाया।
सावित्रीबाई फुले ने पहला स्कूल कब और कहाँ खोला?
जनवरी 1848 में सावित्रीबाई और जोतीराव फुले ने पुणे के भिड़े वाड़ा में लड़कियों का स्कूल खोला, जिसमें सावित्रीबाई शिक्षिका थीं। इसके बाद कुछ ही वर्षों में उन्होंने पुणे में कई और स्कूल खोले, जिनमें तथाकथित निचली जातियों के बच्चों के स्कूल भी थे।
क्या सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं?
उन्हें आम तौर पर भारत की पहली महिला शिक्षिका कहा जाता है, और वे किसी भारतीय द्वारा चलाए गए लड़कियों के स्कूल की शुरुआती प्रशिक्षित भारतीय शिक्षिकाओं में थीं। मिशनरी संस्थाएँ इससे पहले भी कहीं कहीं लड़कियों को पढ़ा रही थीं, इसलिए निबंध में 'पहली भारतीय महिला शिक्षिकाओं में' लिखना ज़्यादा सटीक है।
फ़ातिमा शेख कौन थीं?
परंपरा के अनुसार फ़ातिमा शेख उस्मान शेख की बहन थीं, जिनके घर 1849 में फुले दंपति को आश्रय मिला, और उन्होंने सावित्रीबाई के साथ स्कूल में पढ़ाया। उनके बारे में समकालीन दस्तावेज़ बहुत कम हैं और इतिहासकार उनकी भूमिका के ब्योरे पर बहस करते हैं, पर उन्हें शुरुआती मुस्लिम महिला शिक्षिका के रूप में याद किया जाता है।
सावित्रीबाई फुले का निधन कैसे हुआ?
1897 में पुणे में प्लेग फैला तो सावित्रीबाई ने अपने बेटे डॉ. यशवंत के साथ रोगियों का क्लिनिक चलाया। रोगियों की देखभाल करते हुए वे ख़ुद संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। तब वे 66 वर्ष की थीं।

स्रोत

  • Savitribai Phule Samagra Vangmay, ed. M. G. Mali (1988): काव्यफुले (1854), बावनकशी सुबोध रत्नाकर (1892), पत्र
  • Dhananjay Keer, जोतीराव फुले की अंग्रेज़ी जीवनी (Popular Prakashan, 1964)
  • Rosalind O'Hanlon, Caste, Conflict and Ideology (Cambridge University Press, 1985), जोतीराव फुले और उन्नीसवीं सदी के पश्चिम भारत पर अध्ययन
  • G. P. Deshpande (ed.), Selected Writings of Jotirao Phule (2002)