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राजा राम मोहन राय का जीवन परिचय

7 मिनट

राजा राम मोहन राय (1772 से 27 सितंबर 1833) बंगाल के विद्वान, लेखक और समाज सुधारक थे। उन्होंने एकेश्वरवाद पर फ़ारसी और बांग्ला में लिखा, उपनिषदों का अनुवाद किया, सती प्रथा के ख़िलाफ़ पर्चे लिखकर अभियान चलाया (बंगाल में 4 दिसंबर 1829 को प्रतिबंध), 20 अगस्त 1828 को ब्रह्म सभा की स्थापना की, और आधुनिक शिक्षा व प्रेस की स्वतंत्रता के लिए लड़े। 1833 में इंग्लैंड के ब्रिस्टल में उनका निधन हुआ।

राजा राम मोहन राय के जीवन की मुख्य तिथियाँ

तिथिघटना
22 मई 1772 (परंपरा; कुछ स्रोत 1774)हुगली ज़िले के राधानगर में जन्म
लगभग 1803 से 1804फ़ारसी में 'तुहफ़त उल मुवाहिदीन' (एकेश्वरवादियों को उपहार)
1803 से 1814ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व विभाग में काम, ज़्यादातर रंगपुर में
1815कलकत्ता में बसे; आत्मीय सभा की स्थापना
1815 से 1819वेदांत और उपनिषदों के बांग्ला व अंग्रेज़ी अनुवाद
1818 और 1820सती प्रथा के विरुद्ध दो 'Conference' पर्चे
1820'The Precepts of Jesus' प्रकाशित
1822महिलाओं के संपत्ति अधिकारों पर पर्चा; फ़ारसी अख़बार 'मिरात उल अख़बार'
11 दिसंबर 1823आधुनिक शिक्षा के पक्ष में लॉर्ड एमहर्स्ट को पत्र
20 अगस्त 1828ब्रह्म सभा की पहली बैठक
4 दिसंबर 1829लॉर्ड विलियम बेंटिक के नियम 17 से बंगाल प्रेसीडेंसी में सती पर प्रतिबंध
1830मुग़ल बादशाह की ओर से 'राजा' की उपाधि; इंग्लैंड के लिए रवाना
27 सितंबर 1833ब्रिस्टल के पास स्टेपलटन में निधन

बचपन और पढ़ाई: फ़ारसी, अरबी, संस्कृत और अंग्रेज़ी

राम मोहन का जन्म बंगाल के एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ। उस समय सरकारी काम की भाषा फ़ारसी थी, इसलिए उन्होंने बचपन में फ़ारसी और अरबी सीखी; जीवनियों के अनुसार इसके लिए वे पटना गए। संस्कृत और हिंदू शास्त्रों की पढ़ाई के लिए वे वाराणसी से जुड़े। अंग्रेज़ी उन्होंने बाद में, कंपनी की नौकरी के दौरान, अच्छी तरह सीखी।

इस्लामी दर्शन, उपनिषदों और बाद में ईसाई ग्रंथों को उनकी मूल भाषाओं में पढ़ने से उनके विचार बने। लगभग 1803 में लिखी फ़ारसी किताब 'तुहफ़त उल मुवाहिदीन' में उन्होंने तर्क दिया कि सभी धर्मों का मूल एक ईश्वर में विश्वास है और बाक़ी रीतियाँ बाद में जुड़ीं।

सती प्रथा के विरुद्ध अभियान

सती, यानी पति की चिता पर विधवा को जलाना, उस समय बंगाल में होता था, और कंपनी के आँकड़ों में हर साल सैकड़ों मामले दर्ज थे। उनकी जीवनियों में बताया जाता है कि 1811 के आसपास उनके बड़े भाई की विधवा को सती होते देख उन्होंने इस प्रथा को ख़त्म करने का निश्चय किया; यह प्रसंग परंपरा से आता है।

1818 में उन्होंने बांग्ला और अंग्रेज़ी में 'Conference between an Advocate for and an Opponent of the Practice of Burning Widows Alive' नाम का पर्चा लिखा, जो दो लोगों की बहस के रूप में है। इसमें तर्क है कि शास्त्र सती की अनुमति भले देते हों, उसे अनिवार्य नहीं बताते; कि कई मामलों में स्त्री को मजबूर किया जाता है; और कि विधवा का संयमित जीवन ऊँचा धर्म है। 1820 में उन्होंने दूसरा पर्चा लिखा।

4 दिसंबर 1829 को गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने बंगाल रेगुलेशन 17 से सती को अपराध घोषित किया। कलकत्ता के रूढ़िवादी समूहों ने इसके ख़िलाफ़ लंदन की प्रिवी काउंसिल में अपील की; राम मोहन राय इंग्लैंड में प्रतिबंध के पक्ष में सक्रिय रहे और 1832 में अपील ख़ारिज हुई। इतिहासकार ध्यान दिलाते हैं कि प्रतिबंध का फ़ैसला सरकार का था और इसमें कई लोगों की भूमिका थी, पर राम मोहन राय के लेखन ने इसके पक्ष में भारतीय तर्क तैयार किया।

ब्रह्म सभा: 1828 में क्या शुरू हुआ

1815 में उन्होंने कलकत्ता में आत्मीय सभा बनाई, जहाँ मित्रों के साथ धार्मिक विषयों पर चर्चा होती थी। 20 अगस्त 1828 को उन्होंने ब्रह्म सभा की पहली बैठक की। इसमें मूर्ति के बिना एक निराकार ईश्वर की उपासना, उपनिषदों का पाठ और भजन होते थे। जनवरी 1830 में इसके भवन के ट्रस्ट डीड में लिखा गया कि यहाँ किसी भी धर्म के लोगों का आना मना नहीं होगा।

उनकी मृत्यु के बाद देवेन्द्रनाथ ठाकुर (रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता) ने इसे आगे बढ़ाया और यह ब्रह्म समाज के नाम से जाना गया। टैगोर परिवार के बारे में पढ़ें रवीन्द्रनाथ टैगोर की जीवनी।

शिक्षा, प्रेस और महिलाओं के अधिकार

  • शिक्षा: 11 दिसंबर 1823 को उन्होंने गवर्नर जनरल लॉर्ड एमहर्स्ट को पत्र लिखा कि प्रस्तावित संस्कृत कॉलेज के बजाय गणित, प्राकृतिक दर्शन, रसायन और शरीर रचना जैसे आधुनिक विषय पढ़ाए जाएँ। उन्होंने 1822 में अपना एंग्लो हिंदू स्कूल और 1826 में वेदांत कॉलेज भी शुरू किया।
  • प्रेस: उन्होंने बांग्ला साप्ताहिक 'संवाद कौमुदी' (1821) और फ़ारसी 'मिरात उल अख़बार' (1822) निकाले। 1823 में सरकार ने प्रेस पर लाइसेंस का नियम लगाया तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और राजा के सामने विरोध याचिकाएँ दीं और विरोध में 'मिरात उल अख़बार' बंद कर दिया।
  • महिलाएँ: 1822 के पर्चे 'Brief Remarks regarding Modern Encroachments on the Ancient Rights of Females' में उन्होंने तर्क दिया कि पुराने शास्त्रों में स्त्रियों के संपत्ति अधिकार थे, जिन्हें बाद की प्रथाओं ने छीन लिया।

उनके कुछ विचारों पर बहस भी है। 1831 और 1832 में उन्होंने ब्रिटिश संसद की समिति से कहा कि यूरोपीय लोगों के भारत में बसने से देश को लाभ होगा; इतिहासकार इस पर अलग अलग राय रखते हैं। ईसाई धर्म पर उनकी किताब 'The Precepts of Jesus' (1820) में उन्होंने ईसा की नैतिक शिक्षाओं की प्रशंसा की पर त्रिमूर्ति और चमत्कारों को नहीं माना, जिससे सेरामपुर के मिशनरियों से उनकी लंबी बहस हुई। यानी वे किसी एक पक्ष के आदमी नहीं थे।

इंग्लैंड यात्रा, निधन और विरासत

1830 में मुग़ल बादशाह अकबर द्वितीय ने उन्हें 'राजा' की उपाधि दी और अपनी पेंशन के मामले में अपना दूत बनाकर इंग्लैंड भेजा। नवंबर 1830 में वे जहाज़ से रवाना हुए और अप्रैल 1831 में लिवरपूल पहुँचे। इंग्लैंड में वे संसद की बहसों, समाज सुधारकों और यूनिटेरियन ईसाइयों से मिले।

27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल के पास स्टेपलटन में बीमारी (आम तौर पर मेनिनजाइटिस बताई जाती है) से उनका निधन हुआ। ब्रिस्टल के आर्नोस वेल क़ब्रिस्तान में उनकी समाधि पर बाद में एक छतरी बनाई गई, और ब्रिस्टल शहर के बीच उनकी प्रतिमा भी है।

उन्हें अक्सर 'भारतीय पुनर्जागरण का जनक' या 'आधुनिक भारत का जनक' कहा जाता है। कुछ आलोचक उन्हें अंग्रेज़ी राज के बहुत क़रीब मानते हैं; दूसरों के लिए वे तर्क और सुधार की परंपरा के शुरुआती बड़े नाम हैं। दोनों पक्ष उनके लेखन से समझे जा सकते हैं। एक और बड़ी सुधारक के बारे में पढ़ें सावित्रीबाई फुले की जीवनी।

अगर आप उनसे पूछना चाहते हैं कि उन्होंने सती के विरुद्ध शास्त्रों से ही तर्क क्यों दिए, तो Yuga ऐप में राजा राम मोहन राय के AI रूप से आवाज़ में बात कर सकते हैं। यह उनके लेखन और इतिहासकारों के काम पर बना एक AI पुनर्निर्माण है, असली व्यक्ति नहीं, और यह गलती कर सकता है; निबंध या प्रोजेक्ट में उनके मूल पर्चों और पत्रों का हवाला दें।

लोग क्या पूछते हैं

राजा राम मोहन राय ने ब्रह्म सभा की स्थापना कब की?
राजा राम मोहन राय ने 20 अगस्त 1828 को कलकत्ता में ब्रह्म सभा की पहली बैठक की। इसमें एक निराकार ईश्वर की उपासना और उपनिषदों का पाठ होता था। उनकी मृत्यु के बाद देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे आगे बढ़ाया और यह ब्रह्म समाज के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
सती प्रथा पर प्रतिबंध कब लगा?
4 दिसंबर 1829 को गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने बंगाल रेगुलेशन 17 से बंगाल प्रेसीडेंसी में सती को अपराध घोषित किया। राजा राम मोहन राय ने 1818 और 1820 के पर्चों से इसके पक्ष में तर्क तैयार किए थे, और इंग्लैंड में प्रतिबंध के ख़िलाफ़ अपील का विरोध किया, जो 1832 में ख़ारिज हुई।
राम मोहन राय को 'राजा' की उपाधि किसने दी?
1830 में मुग़ल बादशाह अकबर द्वितीय ने उन्हें 'राजा' की उपाधि दी और अपना दूत बनाकर इंग्लैंड भेजा, ताकि वे बादशाह की पेंशन बढ़ाने का मामला ब्रिटिश सरकार के सामने रखें। वे 1831 में इंग्लैंड पहुँचे और वहीं 1833 में उनका निधन हुआ।
राजा राम मोहन राय की मृत्यु कहाँ हुई?
राजा राम मोहन राय की मृत्यु 27 सितंबर 1833 को इंग्लैंड में ब्रिस्टल के पास स्टेपलटन में हुई। उन्हें ब्रिस्टल के आर्नोस वेल क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, जहाँ बाद में भारतीय शैली की एक छतरी बनाई गई। ब्रिस्टल में उनकी एक प्रतिमा भी है।
राजा राम मोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का जनक क्यों कहते हैं?
उन्होंने 19वीं सदी की शुरुआत में ही तर्क के आधार पर धर्म और समाज पर सवाल उठाए: सती के विरुद्ध लिखा, महिलाओं के संपत्ति अधिकार, आधुनिक शिक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता की माँग की, और ब्रह्म सभा बनाई। बाद के कई सुधारकों ने इसी रास्ते को आगे बढ़ाया, इसलिए उन्हें यह उपाधि दी जाती है।

स्रोत

  • Rammohun Roy, Conference between an Advocate for and an Opponent of the Practice of Burning Widows Alive (1818)
  • Rammohun Roy, Letter to Lord Amherst on Education, 11 December 1823
  • Sophia Dobson Collet, The Life and Letters of Raja Rammohun Roy (1900)
  • Lynn Zastoupil, Rammohun Roy and the Making of Victorian Britain (2010)
  • Bruce Carlisle Robertson (ed.), Raja Rammohan Ray: The Father of Modern India (1995)