अमीर ख़ुसरो का जीवन परिचय
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अमीर ख़ुसरो (1253 से 1325) फ़ारसी के कवि, दरबारी और संगीतज्ञ थे। उनका जन्म पटियाली (आज का उत्तर प्रदेश) में तुर्क पिता और भारतीय माँ के घर हुआ। उन्होंने बलबन के परिवार से लेकर ग़यासुद्दीन तुग़लक़ तक कई दिल्ली सुल्तानों की सेवा की और सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया के प्रिय शिष्य रहे। उनकी फ़ारसी रचनाएँ प्रमाणित हैं; हिंदवी पहेलियाँ, कई गीत और क़व्वाली की शुरुआत उनसे परंपरा के आधार पर जोड़ी जाती हैं।
अमीर ख़ुसरो कौन थे
अमीर ख़ुसरो का पूरा नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन ख़ुसरो था। पिता अमीर सैफ़ुद्दीन महमूद मध्य एशिया से आए तुर्क थे और माँ दिल्ली के एक भारतीय मूल के अमीर परिवार से थीं। पिता की मृत्यु के बाद वे नाना के घर दिल्ली में पले। इसी दोहरी विरासत के कारण उन्होंने ख़ुद को “हिंदुस्तानी तुर्क” कहा और फ़ारसी के साथ हिंदवी पर भी गर्व किया (ग़ुर्रत-उल-कमाल की भूमिका, लगभग 1294)।
वे सुल्तानों के दरबारी कवि थे, इसलिए उनकी बहुत सी रचनाएँ राजाओं की प्रशंसा और युद्धों के वर्णन हैं। साथ ही वे सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे करीबी शिष्यों में थे। दरबार और ख़ानक़ाह, इन दोनों दुनियाओं में उनका एक साथ होना ही उन्हें ख़ास बनाता है। उन्हें “तूती-ए-हिंद”, यानी हिंद का तोता, भी कहा गया।
अमीर ख़ुसरो के जीवन की मुख्य तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1253 | पटियाली (एटा ज़िले के पास) में जन्म |
| 1280 के दशक की शुरुआत | बलबन के बेटे शहज़ादा मुहम्मद की सेवा में मुल्तान गए |
| 1285 | शहज़ादा मुहम्मद मंगोलों से लड़ते हुए मारे गए; ख़ुसरो कुछ समय मंगोलों की क़ैद में रहे और फिर लौटे |
| 1289 | क़िरान-उस-सादैन लिखा |
| 1290 से 1316 | जलालुद्दीन ख़लजी और अलाउद्दीन ख़लजी के दरबार में |
| लगभग 1311 | अलाउद्दीन के अभियानों पर गद्य ग्रंथ ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह |
| 1316 | देवल रानी और ख़िज़्र ख़ाँ की प्रेमकथा आशिक़ा |
| 1318 | नुह सिपिह्र, जिसमें भारत की प्रशंसा है |
| 1325 | निज़ामुद्दीन औलिया की मृत्यु; कुछ महीने बाद ख़ुसरो का भी निधन, गुरु के पास दफ़न |
सुल्तानों के दरबार में: कवि और इतिहास का गवाह
ख़ुसरो ने अपने लंबे जीवन में बलबन के परिवार, कैक़ुबाद, जलालुद्दीन ख़लजी, अलाउद्दीन ख़लजी, क़ुतुबुद्दीन मुबारक शाह और ग़यासुद्दीन तुग़लक़ जैसे शासकों को देखा। हर बदलते शासक के साथ वे नए दरबार में जगह बनाते रहे, जो उस हिंसक राजनीतिक दौर में आसान नहीं था।
उनकी ऐतिहासिक मसनवियाँ घटनाओं की गवाह हैं। क़िरान-उस-सादैन (1289) में सुल्तान कैक़ुबाद और उनके पिता बुग़रा ख़ाँ के मिलन को दो शुभ ग्रहों का मेल कहा गया है। ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह में अलाउद्दीन ख़लजी के दक्कन और दूसरे अभियानों को बढ़ा-चढ़ाकर, अलंकृत भाषा में इस्लाम की जीत बताया गया है। इतिहासकार इन ग्रंथों का उपयोग करते हैं, पर याद रखते हैं कि ये दरबारी प्रशंसा हैं, निष्पक्ष विवरण नहीं।
नुह सिपिह्र (1318) में उन्होंने तर्क दिए कि भारत ज्ञान, भाषाओं, जलवायु और लोगों की बुद्धि में दूसरे देशों से बढ़कर है, और यहाँ की विद्या, अंकों और शतरंज की प्रशंसा की। एक अंश में वे लिखते हैं कि ख़ुरासान, यूनान या अरब से आने वाले को यहाँ कोई परेशानी नहीं होगी, क्योंकि लोग उसे अपना मानकर अपनाएँगे (In the Bazaar of Love, 2011, भूमिका, पृ. xxxvi में दिए अंग्रेज़ी अनुवाद से भाव)।
निज़ामुद्दीन औलिया और ख़ुसरो का रिश्ता
चिश्ती सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली के ग़यासपुर में रहते थे। ख़ुसरो उनके मुरीद बने और जीवन भर उनसे जुड़े रहे। संत की बातों का संग्रह फ़वाइद-उल-फ़ुआद, जिसे उनके दूसरे शिष्य अमीर हसन सिजज़ी ने लिखा, इस माहौल की सबसे भरोसेमंद झलक देता है।
1325 में निज़ामुद्दीन औलिया का निधन हुआ और उसी साल कुछ महीने बाद ख़ुसरो भी नहीं रहे। उन्हें दिल्ली में गुरु की दरगाह के पास दफ़नाया गया, और आज भी दरगाह पर आने वाले ख़ुसरो की मज़ार पर भी जाते हैं। गुरु की मृत्यु पर ख़ुसरो के दुख की कहानियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं; इनमें से कई बाद की परंपरा से आती हैं, इसलिए उन्हें श्रद्धा से पर किंवदंती के रूप में पढ़ना चाहिए।
अमीर ख़ुसरो की रचनाएँ: क्या प्रमाणित है
ख़ुसरो की फ़ारसी रचनाएँ पांडुलिपियों में सुरक्षित हैं और विद्वान उन्हें उनका मानते हैं। मुख्य रचनाएँ:
- पाँच दीवान (ग़ज़लों और क़सीदों के संग्रह), जिनमें तुहफ़त-उस-सिग़र और ग़ुर्रत-उल-कमाल शामिल हैं।
- ख़म्सा: फ़ारसी कवि निज़ामी के जवाब में लिखी पाँच मसनवियाँ, जैसे मजनूँ-लैला और शीरीं-ख़ुसरो।
- ऐतिहासिक मसनवियाँ: क़िरान-उस-सादैन, मिफ़्ताह-उल-फ़ुतूह, आशिक़ा, नुह सिपिह्र और तुग़लक़नामा।
- गद्य: ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह, और फ़ारसी गद्य व पत्र-लेखन के नियमों पर एजाज़-ए-ख़ुसरवी।
पहेलियाँ, क़व्वाली और सितार: परंपरा और प्रमाण
बहुत सी हिंदवी पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो-सुख़ने, गीत जैसे “छाप तिलक सब छीनी” और क़व्वाली व तराना की शुरुआत परंपरा से ख़ुसरो के नाम जुड़ी हैं। समस्या यह है कि इनमें से ज़्यादातर की सबसे पुरानी लिखित प्रतियाँ उनके सदियों बाद की हैं। इसलिए विद्वान, जैसे सुनील शर्मा (Amir Khusraw: The Poet of Sultans and Sufis, 2005), इन्हें “परंपरा से जुड़ा” कहते हैं, प्रमाणित नहीं।
उदाहरण के लिए यह पहेली ख़ुसरो के नाम से बहुत प्रचलित है। इसे परंपरा की रचना मानें, उनकी लिखी साबित पंक्ति नहीं:
“एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा। चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।”
सितार और तबले का आविष्कार भी उनसे जोड़ा जाता है। संगीत इतिहासकार इस दावे को कमज़ोर मानते हैं, क्योंकि उनके समय के किसी स्रोत में इसका उल्लेख नहीं है और ये वाद्य बाद की सदियों में विकसित हुए दिखते हैं। निबंध में लिखें: “परंपरा के अनुसार”, और साथ में यह बताएँ कि इतिहासकार इस पर संदेह करते हैं।
ख़ुसरो के बारे में पढ़ाई और अभ्यास
प्रोजेक्ट के लिए दो हिस्से बनाइए: एक, प्रमाणित फ़ारसी रचनाएँ और उनसे मिलने वाला इतिहास; दूसरा, लोक परंपरा जो उनके नाम से चलती है। यह फ़र्क़ दिखाना ही अच्छे प्रोजेक्ट की पहचान है। इतिहास के व्यक्तियों से पूछे जा सकने वाले सवालों के लिए यह सूची देखें।
आप Yuga ऐप में अमीर ख़ुसरो से आवाज़ या टेक्स्ट में बात करके सवाल पूछने का अभ्यास कर सकते हैं। यह उनकी रचनाओं और ऐतिहासिक स्रोतों से बना AI पुनर्निर्माण है, असली ख़ुसरो नहीं, और यह ग़लती कर सकता है। प्रोजेक्ट में ऐप को नहीं, मूल ग्रंथों और विद्वानों की किताबों को उद्धृत करें। उसी दौर की एक और कहानी के लिए रज़िया सुल्तान का लेख पढ़ें।
लोग क्या पूछते हैं
- अमीर ख़ुसरो का जन्म कहाँ हुआ था?
- अमीर ख़ुसरो का जन्म 1253 में पटियाली में हुआ, जो आज उत्तर प्रदेश के कासगंज ज़िले में है (पहले एटा ज़िले का हिस्सा)। उनके पिता अमीर सैफ़ुद्दीन महमूद तुर्क थे और माँ एक भारतीय मूल के परिवार से थीं। पिता की मृत्यु के बाद उनका पालन दिल्ली में नाना के घर हुआ।
- क्या अमीर ख़ुसरो ने सितार और तबले का आविष्कार किया?
- यह परंपरा में कहा जाता है, पर इसका प्रमाण नहीं है। ख़ुसरो के समय के किसी स्रोत में ऐसा उल्लेख नहीं मिलता, और संगीत इतिहासकार मानते हैं कि ये वाद्य बाद की सदियों में विकसित हुए। संगीत में उनका योगदान वास्तविक माना जाता है, पर सितार और तबले वाला दावा किंवदंती की श्रेणी में आता है।
- क्या ख़ुसरो की सारी पहेलियाँ उन्हीं की लिखी हैं?
- पक्का नहीं कहा जा सकता। हिंदवी पहेलियों, मुकरियों और कई गीतों की सबसे पुरानी लिखित प्रतियाँ उनके सदियों बाद की हैं। इसलिए विद्वान इन्हें परंपरा से उनके नाम जुड़ी रचनाएँ मानते हैं। उनकी फ़ारसी रचनाएँ, जैसे ख़म्सा और नुह सिपिह्र, प्रमाणित हैं।
- अमीर ख़ुसरो की मज़ार कहाँ है?
- उनकी मज़ार दिल्ली में उनके गुरु निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के परिसर में है। निज़ामुद्दीन औलिया का निधन 1325 में हुआ और ख़ुसरो का उसी साल कुछ महीने बाद। दरगाह पर आने वाले श्रद्धालु दोनों की मज़ारों पर जाते हैं।
स्रोत
- नुह सिपिह्र, क़िरान-उस-सादैन, ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह, एजाज़-ए-ख़ुसरवी (अमीर ख़ुसरो के फ़ारसी ग्रंथ)
- Khaza'in al-Futuh, अंग्रेज़ी अनुवाद Muhammad Habib, 1931
- फ़वाइद-उल-फ़ुआद, अमीर हसन सिजज़ी; अंग्रेज़ी अनुवाद Bruce B. Lawrence, 1992
- Amir Khusraw: The Poet of Sultans and Sufis, Sunil Sharma, 2005
- The Life and Works of Amir Khusrau, Mohammad Wahid Mirza, 1935
- In the Bazaar of Love: The Selected Poetry of Amir Khusrau, 2011