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तानसेन का जीवन परिचय

6 मिनट

तानसेन मुग़ल काल के सबसे प्रसिद्ध गायक और ध्रुपद के उस्ताद थे। उनका जन्म लगभग 1500 के आसपास ग्वालियर क्षेत्र में माना जाता है (सही वर्ष अनिश्चित है) और 1589 में निधन हुआ। रीवा के राजा रामचंद्र के दरबार के बाद 1562 में वे मुग़ल दरबार पहुँचे। मियाँ की तोड़ी, दरबारी कान्हड़ा और मियाँ की मल्हार परंपरा से उनसे जुड़े हैं। दीपक राग गाकर दीये जलाने की कहानी किंवदंती है, इतिहास नहीं।

तानसेन कौन थे

तानसेन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इतिहास में सबसे जाने-माने नाम हैं। वे ध्रुपद शैली के गायक थे, जो धीमी, गंभीर और शब्द-प्रधान गायकी है। उन्हें “मियाँ तानसेन” कहा जाता है, और कई रागों के नाम में “मियाँ की” जुड़ा होना उन्हीं की याद है।

उनके बचपन के बारे में ज़्यादातर बातें परंपरा से आती हैं। परंपरा के अनुसार उनका बचपन का नाम रामतनु या तन्ना था, वे ग्वालियर के पास बेहट गाँव में मुकुंद मिश्र के घर जन्मे, और वृंदावन के संत स्वामी हरिदास से संगीत सीखा। इनमें से कोई बात समकालीन दस्तावेज़ से पक्की नहीं होती, इसलिए इन्हें “परंपरा के अनुसार” लिखना चाहिए।

तानसेन के जीवन की मुख्य तिथियाँ

समयघटनास्रोत
लगभग 1500 (कुछ स्रोत 1506)ग्वालियर क्षेत्र में जन्मपरंपरा; सही वर्ष अनिश्चित
सोलहवीं सदी की शुरुआतग्वालियर की संगीत परंपरा में प्रशिक्षण, जो राजा मान सिंह तोमर के समय से प्रसिद्ध थीइतिहासकारों का अनुमान
1550 का दशकरीवा (बांधवगढ़) के राजा रामचंद्र बघेला के दरबार में गायकअबुल फ़ज़ल, अकबरनामा
1562मुग़ल दरबार में बुलाए गएअबुल फ़ज़ल, अकबरनामा
लगभग 1595आइन-ए-अकबरी में उन्हें हज़ार साल में भारत का सबसे बड़ा गायक लिखा गयाअबुल फ़ज़ल, आइन-ए-अकबरी
1589निधन; ग्वालियर में सूफ़ी संत मुहम्मद ग़ौस के मक़बरे के पास दफ़नअकबरनामा; ग्वालियर की समाधि

ग्वालियर, रीवा और मुग़ल दरबार

पंद्रहवीं सदी के अंत में ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर ध्रुपद के बड़े संरक्षक थे, और ग्वालियर संगीत का केंद्र बन गया था। तानसेन इसी परंपरा में तैयार हुए। ग्वालियर के सूफ़ी संत मुहम्मद ग़ौस से भी उनका गहरा संबंध बताया जाता है, और उनकी समाधि आज उन्हीं के मक़बरे के पास है।

कई साल वे रीवा के राजा रामचंद्र बघेला के दरबार में रहे। अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा के अनुसार 1562 में बादशाह अकबर ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया, और राजा रामचंद्र ने उन्हें भेज दिया। उसके बाद वे जीवन भर मुग़ल दरबार के मुख्य गायक रहे।

दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने आइन-ए-अकबरी में दरबार के संगीतकारों की सूची में तानसेन को सबसे ऊपर रखा और लिखा कि पिछले हज़ार साल में भारत में उनके जैसा गायक नहीं हुआ। ध्यान दें: यह अबुल फ़ज़ल का कथन है, तानसेन का अपना नहीं। तानसेन के अपने लिखे शब्द लगभग नहीं बचे हैं।

तानसेन के राग और ध्रुपद रचनाएँ

परंपरा कई रागों को तानसेन की रचना या उनके दिए रूप से जोड़ती है:

  • मियाँ की तोड़ी: सुबह का राग।
  • दरबारी कान्हड़ा: रात का गंभीर राग; नाम से ही दरबार से संबंध झलकता है।
  • मियाँ की मल्हार: वर्षा ऋतु का राग।
  • मियाँ की सारंग: दोपहर का राग।

ये सब “परंपरा से” उनसे जुड़े हैं। कई ध्रुपद रचनाएँ भी उनके नाम से गाई जाती हैं, जिनमें गणेश और सरस्वती की वंदना है, संरक्षक राजाओं की प्रशंसा है और सूफ़ी संतों का स्मरण भी। बाद के गीत-संग्रहों में मिलने के कारण इनका लेखक होना पक्का नहीं है। ब्रजभाषा में संगीत पर दो ग्रंथ, संगीत सार और राग माला, भी उनसे जोड़े जाते हैं, पर उनकी लेखकता पर भी संदेह है।

उनके वंशजों और शिष्यों की परंपरा “सेनिया घराना” कहलाती है। उनके बेटे बिलास ख़ाँ के नाम से बिलासख़ानी तोड़ी राग जुड़ा है।

दीपक राग और दूसरी किंवदंतियाँ: क्या सच है

सबसे प्रसिद्ध कहानी यह है कि दरबार में तानसेन ने दीपक राग गाया, दीये अपने आप जल उठे और गाने की गर्मी से उनका शरीर जलने लगा। फिर किसी ने मल्हार गाकर वर्षा कराई और उन्हें ठंडक मिली। कुछ रूपों में यह मल्हार गुजरात के वडनगर की दो बहनों, ताना और रीरी, ने गाया। यह किंवदंती है। किसी समकालीन स्रोत में इसका उल्लेख नहीं है।

दूसरी लोकप्रिय कहानी बैजू बावरा के साथ संगीत मुक़ाबले की है, जिसे 1952 की फ़िल्म बैजू बावरा ने बहुत प्रसिद्ध किया। यह भी किंवदंती है; इतिहासकार बैजू के जीवन के बारे में बहुत कम जानते हैं और इस मुक़ाबले का कोई दस्तावेज़ नहीं है।

ऐसी कहानियाँ यह बताती हैं कि लोग तानसेन के संगीत को कितना असरदार मानते थे। निबंध में इन्हें ज़रूर लिखें, पर साफ़ शब्दों में बताएँ कि ये किंवदंती हैं। जो बातें इतिहास से पक्की हैं वे हैं: ग्वालियर की परंपरा, रीवा का दरबार, 1562 में मुग़ल दरबार में आना, अबुल फ़ज़ल का मूल्यांकन और 1589 में निधन।

तानसेन के बारे में रोचक तथ्य

  • हर साल दिसंबर में ग्वालियर में उनकी समाधि के पास तानसेन समारोह होता है, जो देश के पुराने शास्त्रीय संगीत समारोहों में है।
  • समाधि के पास एक इमली का पेड़ है। लोक मान्यता है कि उसकी पत्तियाँ चबाने से आवाज़ मीठी होती है; यह आस्था है, कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं।
  • उनके धर्म को लेकर आज कई दावे किए जाते हैं। स्रोत बस इतना दिखाते हैं कि उनकी रचनाओं में हिंदू देवताओं की वंदना और सूफ़ी संतों का आदर दोनों हैं।

पढ़ाई और प्रोजेक्ट के लिए सुझाव

एक अच्छा प्रोजेक्ट तीन हिस्सों में बँट सकता है: पक्का इतिहास (तालिका ऊपर), परंपरा से जुड़े राग, और किंवदंतियाँ। किसी रिकॉर्डिंग में मियाँ की तोड़ी या दरबारी कान्हड़ा सुनकर उसके समय और भाव पर एक अनुच्छेद लिखना भी अच्छा अभ्यास है।

आप Yuga ऐप में तानसेन से आवाज़ या टेक्स्ट में बात करके इंटरव्यू का अभ्यास कर सकते हैं। यह ऐतिहासिक स्रोतों से बना एक AI पुनर्निर्माण है, असली तानसेन नहीं; तानसेन के अपने लिखे शब्द बहुत कम बचे हैं, इसलिए उसकी बातें व्याख्या हैं और ग़लत भी हो सकती हैं। प्रोजेक्ट में अबुल फ़ज़ल के ग्रंथों और इतिहासकारों की किताबों को उद्धृत करें। उसी दरबार के एक और व्यक्ति के बारे में बीरबल का इतिहास और कहानियाँ पढ़ें।

लोग क्या पूछते हैं

तानसेन का असली नाम क्या था?
परंपरा के अनुसार उनका बचपन का नाम रामतनु या तन्ना था और पिता का नाम मुकुंद मिश्र। ये बातें बाद की परंपरा से आती हैं, किसी समकालीन दस्तावेज़ से नहीं। मुग़ल दरबार के स्रोत उन्हें तानसेन ही कहते हैं, और “मियाँ” की उपाधि उनके नाम से जुड़ गई।
क्या तानसेन ने दीपक राग गाकर दीये जलाए थे?
नहीं, यह किंवदंती है। किसी समकालीन स्रोत में यह घटना नहीं मिलती। अबुल फ़ज़ल, जिन्होंने दरबार के संगीतकारों के बारे में लिखा, इसका कोई उल्लेख नहीं करते। यह कहानी तानसेन के संगीत के असर को दिखाने वाली लोककथा है, और उसे इसी रूप में पढ़ना चाहिए।
तानसेन के गुरु कौन थे?
परंपरा के अनुसार उनके गुरु वृंदावन के संत स्वामी हरिदास थे। इतिहासकार यह भी मानते हैं कि उनका प्रशिक्षण ग्वालियर की ध्रुपद परंपरा में हुआ, जो राजा मान सिंह तोमर के समय से प्रसिद्ध थी। सूफ़ी संत मुहम्मद ग़ौस से भी उनका गहरा संबंध बताया जाता है।
तानसेन की समाधि कहाँ है?
उनकी समाधि ग्वालियर में सूफ़ी संत मुहम्मद ग़ौस के मक़बरे के पास है। उनका निधन 1589 में हुआ। हर साल दिसंबर में यहाँ तानसेन समारोह होता है, जिसमें देश भर के शास्त्रीय संगीतकार प्रस्तुति देते हैं।

स्रोत

  • आइन-ए-अकबरी, अबुल फ़ज़ल; अंग्रेज़ी अनुवाद H. Blochmann और H. S. Jarrett, 1873 से 1894
  • अकबरनामा, अबुल फ़ज़ल; अंग्रेज़ी अनुवाद H. Beveridge
  • Imaging Sound: An Ethnomusicological Study of Music, Art, and Culture in Mughal India, Bonnie C. Wade, 1998
  • Hindustani Music: Thirteenth to Twentieth Centuries, सं. Joep Bor, Françoise Delvoye, Jane Harvey, Emmie te Nijenhuis, 2010