सीधे सामग्री पर जाएँ

राजराज चोल प्रथम का जीवन परिचय

6 मिनट

राजराज चोल प्रथम (जन्म नाम अरुलमोळि वर्मन, जन्म लगभग 947, मृत्यु 1014) ने 985 से 1014 तक तंजावुर से चोल राज्य पर शासन किया और उसे दक्षिण भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनाया। उन्होंने केरल तट, उत्तरी श्रीलंका और मालदीव तक अभियान चलाए, 1001 के आसपास भूमि सर्वेक्षण कराया, और तंजावुर का बृहदीश्वर (राजराजेश्वरम्) मंदिर बनवाया, जो लगभग 1010 में पूरा हुआ। उनके बारे में ज़्यादातर जानकारी शिलालेखों और ताम्रपत्रों से मिलती है।

राजराज चोल कौन थे

राजराज का जन्म नाम अरुलमोळि वर्मन था। वे चोल राजा सुंदर चोल (परांतक द्वितीय) और रानी वानवन महादेवी के बेटे थे। उनके बड़े भाई आदित्य द्वितीय की लगभग 969 में हत्या हुई, और उसके बाद चाचा उत्तम चोल ने 970 से 985 तक राज किया। 985 में अरुलमोळि गद्दी पर बैठे और “राजराज”, यानी राजाओं के राजा, नाम लिया।

उनकी बड़ी बहन कुंदवै का दरबार और मंदिरों पर बड़ा प्रभाव था; तंजावुर मंदिर के शिलालेखों में उनके दान भी दर्ज हैं। राजराज के बेटे राजेंद्र प्रथम ने 1012 से उनके साथ सह-शासक के रूप में काम किया और 1014 से 1044 तक राज करके चोल शक्ति को गंगा और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचाया।

राजराज चोल के जीवन की मुख्य तिथियाँ

वर्ष (ईसवी)घटना
लगभग 947जन्म (परंपरागत अनुमान)
लगभग 969बड़े भाई आदित्य द्वितीय की हत्या
985राजा बने
लगभग 988 से 993केरल तट पर कांदलूर शालै में चेरों के जहाज़ों पर हमला; पांड्य और चेर राज्यों पर विजय
लगभग 993उत्तरी श्रीलंका पर विजय; अनुराधापुर पर हमला; पोलोन्नरुवा को प्रांतीय राजधानी बनाया
लगभग 1001राज्य में भूमि का सर्वेक्षण और कर का पुनर्निर्धारण
लगभग 1010तंजावुर का बृहदीश्वर (राजराजेश्वरम्) मंदिर पूरा
1012राजेंद्र प्रथम सह-शासक बने
1014मृत्यु

सैन्य अभियान: ज़मीन और समुद्र पर

राजराज के शिलालेखों की शुरुआत में एक मेयकीर्ति होती है, यानी राजा की उपलब्धियों का काव्यात्मक वर्णन। इसमें कांदलूर शालै में जहाज़ नष्ट करना, पांड्य और चेर राजाओं को हराना, “ईलम” (श्रीलंका) और “बारह हज़ार पुराने द्वीप” (मालदीव) जीतना गिनाया गया है। ये दावे राजा की अपनी प्रशंसा हैं, फिर भी दूसरे स्रोत इनमें से कई की पुष्टि करते हैं।

श्रीलंका पर हमले में अनुराधापुर लूटा गया और कई बौद्ध स्थलों को नुकसान हुआ। श्रीलंका का पाली इतिहास ग्रंथ चूळवंश इसका वर्णन पीड़ित पक्ष की नज़र से करता है। उत्तरी लंका चोल प्रांत बना और पोलोन्नरुवा का नाम जननाथमंगलम् रखा गया। यह इतिहास आज भी श्रीलंका के सिंहली और तमिल समुदायों के लिए संवेदनशील है, इसलिए इसे दोनों स्रोतों के साथ पढ़ना चाहिए।

उत्तर में उन्होंने पश्चिमी चालुक्यों से युद्ध किया और वेंगी के पूर्वी चालुक्यों से वैवाहिक संबंध बनाकर उन्हें अपने पक्ष में रखा। उनकी बेटी कुंदवै (बहन से अलग) का विवाह वेंगी के राजकुमार विमलादित्य से हुआ।

बृहदीश्वर मंदिर: लगभग 1010 में बना राजराजेश्वरम्

तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, जिसे राजराज ने राजराजेश्वरम् नाम दिया, लगभग 1010 में उनके शासन के पच्चीसवें वर्ष में पूरा हुआ। यह ग्रेनाइट से बना है और इसका विमान (गर्भगृह के ऊपर का शिखर) लगभग 66 मीटर ऊँचा है, जो उस समय भारत के सबसे ऊँचे मंदिर शिखरों में था। शिलालेखों में इसके मुख्य शिल्पी का नाम कुंजर मल्लन राजराज पेरुंतच्चन दिया गया है।

मंदिर की दीवारों पर लंबे तमिल शिलालेख हैं। इनमें राजा, उनकी बहन, रानियों और अधिकारियों के दान, गाँवों से आने वाली आय, और मंदिर के कर्मचारियों की सूची दर्ज है। एक शिलालेख के अनुसार दूसरे मंदिरों से लगभग 400 मंदिर-स्त्रियों (तलिच्चेरि पेंडिर) को यहाँ लाया गया और हर एक को घर और ज़मीन दी गई; साथ में संगीतकारों, दीपक जलाने वालों और दूसरे कर्मचारियों के नाम भी हैं। इतिहासकार इन सूचियों से उस समय की सामाजिक व्यवस्था और जाति ढाँचे को समझते हैं।

1987 में यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ। 2004 में गंगैकोंडचोलपुरम् और दारासुरम् के मंदिर जोड़कर इस सूची का नाम “महान जीवित चोल मंदिर” रखा गया। 2010 में मंदिर के एक हज़ार साल पूरे होने पर तंजावुर में बड़ा समारोह हुआ।

प्रशासन: भूमि सर्वेक्षण और ग्राम सभाएँ

लगभग 1001 में राजराज ने अपने राज्य की ज़मीन का सर्वेक्षण और कर का दोबारा निर्धारण कराया। उनके शिलालेखों में गाँवों की सभाओं (जैसे ब्राह्मण गाँवों की सभा और दूसरे गाँवों के ऊर) के फ़ैसले, ज़मीन के माप और कर की रकम बहुत बारीकी से दर्ज है।

उन्होंने केवल शैव मंदिरों को ही दान नहीं दिया। लेडेन के बड़े ताम्रपत्रों (आनैमंगलम् दान) के अनुसार उन्होंने नागपट्टिनम् के चूड़ामणि विहार को एक गाँव की आय दी। यह बौद्ध विहार श्रीविजय (आज के इंडोनेशिया और मलेशिया का क्षेत्र) के शैलेंद्र राजा ने बनवाया था, और राजेंद्र ने यह दान पूरा किया।

राजराज चोल के बारे में रोचक तथ्य और मिथक

  • एक लोकप्रिय दावा है कि बृहदीश्वर मंदिर के शिखर की छाया ज़मीन पर नहीं पड़ती। यह ग़लत है; दोपहर के अलावा बाक़ी समय छाया साफ़ दिखती है।
  • शिखर के ऊपर के पत्थर के वज़न के बारे में बहुत बड़े आँकड़े बताए जाते हैं, पर उसके एक ही पत्थर होने और वज़न के ठीक आँकड़े की पुष्टि नहीं है।
  • कल्कि कृष्णमूर्ति का तमिल उपन्यास पोन्नियिन सेल्वन (1950 के दशक में धारावाहिक रूप में छपा) और उस पर बनी फ़िल्में राजराज की युवावस्था पर आधारित हैं, पर वे कथा-साहित्य हैं, इतिहास नहीं।

पढ़ाई और प्रोजेक्ट के लिए सुझाव

राजराज पर अच्छा प्रोजेक्ट शिलालेखों से शुरू होता है: South Indian Inscriptions के दूसरे खंड में तंजावुर मंदिर के शिलालेख अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ हैं। किसी एक शिलालेख से यह निकालिए कि उसमें कौन, किसे, क्या दे रहा है। इससे इतिहास किताब की बजाय पत्थर से पढ़ने का अनुभव मिलता है।

आप Yuga ऐप में राजराज चोल से आवाज़ या टेक्स्ट में बात करके इंटरव्यू का अभ्यास कर सकते हैं। यह शिलालेखों और इतिहास से बना एक AI पुनर्निर्माण है, असली राजा नहीं, और यह ग़लती कर सकता है। प्रोजेक्ट में ऐप को नहीं, शिलालेखों और के. ए. नीलकंठ शास्त्री जैसे इतिहासकारों को उद्धृत करें। दक्षिण भारत के एक और महान शासक के लिए कृष्णदेवराय की जीवनी पढ़ें।

लोग क्या पूछते हैं

बृहदीश्वर मंदिर कब और किसने बनवाया?
तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर चोल राजा राजराज प्रथम ने बनवाया और यह लगभग 1010 ईसवी में, उनके शासन के पच्चीसवें वर्ष में पूरा हुआ। राजराज ने इसे राजराजेश्वरम् नाम दिया। शिलालेखों में मुख्य शिल्पी का नाम कुंजर मल्लन राजराज पेरुंतच्चन मिलता है। 1987 से यह यूनेस्को विश्व धरोहर है।
राजराज चोल का असली नाम क्या था?
उनका जन्म नाम अरुलमोळि वर्मन था। 985 में राजा बनने पर उन्होंने राजराज नाम लिया, जिसका अर्थ है राजाओं का राजा। तमिल में उन्हें राजराज चोळन कहा जाता है, और पोन्नियिन सेल्वन उपन्यास का शीर्षक भी उन्हीं के एक लोकप्रिय नाम से लिया गया है।
राजराज चोल ने किन क्षेत्रों को जीता?
उनके शिलालेखों के अनुसार उन्होंने केरल तट पर कांदलूर शालै में चेर जहाज़ नष्ट किए, पांड्य और चेर राज्यों को हराया, उत्तरी श्रीलंका जीता और अनुराधापुर पर हमला किया, और मालदीव पर अधिकार किया। उत्तर में पश्चिमी चालुक्यों से लड़ाई की और वेंगी से वैवाहिक संबंध बनाए।
क्या पोन्नियिन सेल्वन सच्ची कहानी है?
नहीं, यह कल्कि कृष्णमूर्ति का ऐतिहासिक उपन्यास है। इसके कई पात्र असली हैं, जैसे अरुलमोळि वर्मन, कुंदवै और आदित्य द्वितीय, और आदित्य की हत्या भी ऐतिहासिक घटना है। पर संवाद, षड्यंत्र और ज़्यादातर घटनाएँ लेखक की कल्पना हैं।

स्रोत

  • South Indian Inscriptions, खंड 2, तंजावुर मंदिर के शिलालेख, सं. E. Hultzsch
  • लेडेन के बड़े ताम्रपत्र (आनैमंगलम् दान)
  • चूळवंश, श्रीलंका का पाली इतिहास ग्रंथ
  • The Colas, K. A. Nilakanta Sastri, 1935 से 1937
  • Art of the Imperial Cholas, Vidya Dehejia, 1990
  • Great Living Chola Temples, UNESCO World Heritage Centre