कृष्णदेवराय का जीवन परिचय
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कृष्णदेवराय (लगभग 1471 से 1529) तुलुव वंश के विजयनगर सम्राट थे, जिन्होंने 1509 से 1529 तक राज किया और साम्राज्य को उसके सबसे बड़े विस्तार तक पहुँचाया। उन्होंने ओडिशा के गजपति राजाओं को हराया, 1520 में बीजापुर के आदिलशाह से रायचूर जीता, पश्चिमी तट के बंदरगाहों से व्यापार बढ़ाया और तेलुगु में आमुक्तमाल्यदा लिखा। पुर्तगाली यात्री डोमिंगोस पाइस ने उनके दरबार और राजधानी का आँखों देखा वर्णन किया।
कृष्णदेवराय कौन थे
कृष्णदेवराय विजयनगर साम्राज्य के तीसरे वंश, तुलुव वंश, के सबसे प्रसिद्ध शासक थे। वे तुलुव नरस नायक और नागला देवी के बेटे थे। 1509 में अपने बड़े सौतेले भाई वीर नरसिंह राय के बाद वे गद्दी पर बैठे। उनके अनुभवी मंत्री सालुव तिम्मरसु, जिन्हें तेलुगु परंपरा में “अप्पाजी” कहा जाता है, शासन में उनके सबसे बड़े सहायक थे।
विजयनगर की राजधानी तुंगभद्रा नदी के किनारे थी, जिसके खंडहर आज हम्पी (कर्नाटक) में हैं। उस समय यह भारत के सबसे बड़े और धनी नगरों में थी। कृष्णदेवराय को कन्नड़ और तेलुगु, दोनों समुदाय अपना मानते हैं; वे संस्कृत, तेलुगु और कन्नड़ के कवियों के संरक्षक थे।
कृष्णदेवराय के जीवन की मुख्य तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| लगभग 1471 | जन्म |
| 1509 | विजयनगर के सम्राट बने |
| 1509 से 1510 | बहमनी सल्तनत से निकले राज्यों के आक्रमण को रोका |
| 1513 से 1518 | ओडिशा के गजपति राजा प्रतापरुद्र के ख़िलाफ़ अभियान; उदयगिरि, कोंडविडु और कोंडपल्ली जीते; बाद में संधि और विवाह संबंध |
| 1515 के आसपास | उदयगिरि से लाई बालकृष्ण की मूर्ति के लिए हम्पी में कृष्ण मंदिर |
| 1520 | रायचूर की लड़ाई में बीजापुर के इस्माइल आदिलशाह को हराया |
| लगभग 1520 से 1522 | पुर्तगाली यात्री डोमिंगोस पाइस का विजयनगर आना |
| 1529 | मृत्यु; सौतेले भाई अच्युत देवराय उत्तराधिकारी बने |
युद्ध और विस्तार: गजपति और रायचूर
विजयनगर के उत्तर में दक्कन की सल्तनतें थीं, जिनसे रायचूर दोआब (कृष्णा और तुंगभद्रा के बीच का उपजाऊ इलाक़ा) के लिए पीढ़ियों से लड़ाई चल रही थी। पूर्व में ओडिशा के गजपति राजाओं ने आंध्र तट के बड़े हिस्से पर अधिकार कर रखा था।
1513 से 1518 के बीच कृष्णदेवराय ने गजपति राज्य के क़िले, जैसे उदयगिरि और कोंडविडु, जीते। अभियान संधि पर ख़त्म हुआ और गजपति राजा की बेटी से उनका विवाह हुआ। 1520 में रायचूर की लड़ाई में उन्होंने बीजापुर के इस्माइल आदिलशाह को हराकर रायचूर का क़िला जीता। पुर्तगाली लेखक फ़र्नाओ नूनिज़ ने इस लड़ाई का विस्तृत वर्णन किया है।
उन्होंने पुर्तगालियों से अच्छे संबंध रखे, जिन्होंने 1510 में गोवा पर क़ब्ज़ा किया था। इसका एक बड़ा कारण था घोड़ों का व्यापार: विजयनगर की घुड़सवार सेना के लिए अरब और फ़ारस से आने वाले घोड़े ज़रूरी थे, और ये पश्चिमी तट के बंदरगाहों से आते थे।
आमुक्तमाल्यदा: एक राजा की तेलुगु कविता
कृष्णदेवराय ख़ुद कवि थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना तेलुगु महाकाव्य आमुक्तमाल्यदा है, जिसका अर्थ है “वह जिसने पहनी हुई माला अर्पित की”। यह तमिल वैष्णव संत आण्डाल की कथा है, जो भगवान रंगनाथ (विष्णु) को समर्पित करने से पहले माला ख़ुद पहनकर देखती थीं, और विष्णु से उनके विवाह की कथा। इसे तेलुगु साहित्य के पाँच महान काव्यों (पंच काव्य) में गिना जाता है।
परंपरा के अनुसार इसकी भूमिका में स्वप्न में आए आंध्र महाविष्णु कहते हैं कि देश की भाषाओं में तेलुगु सबसे श्रेष्ठ है। यह पंक्ति आज तेलुगु भाषा के गौरव के रूप में बहुत उद्धृत होती है:
“देश भाषलंदु तेलुगु लेस्स”
इस काव्य के एक भाग में राजनीति (राजनीति शास्त्र) पर सलाह है: राजा को बंदरगाह अच्छी हालत में रखने चाहिए, विदेशी व्यापारियों को बुलाकर अच्छा व्यवहार करना चाहिए ताकि घोड़े और हाथी आएँ, किसानों की रक्षा करनी चाहिए और तालाबों व सिंचाई का ध्यान रखना चाहिए। इतिहासकार इसे उस समय के राजकाज की सोच समझने का अच्छा स्रोत मानते हैं। उन्होंने संस्कृत में जांबवती कल्याणम् नाटक भी लिखा।
अष्टदिग्गज और दरबार के विद्वान
तेलुगु परंपरा कहती है कि उनके दरबार में आठ महान कवि थे, जिन्हें “अष्टदिग्गज” (आठ दिशाओं के हाथी) कहा गया। आम तौर पर गिनाए जाने वाले नाम:
- अल्लसानि पेद्दना, जिन्हें “आंध्र कविता पितामह” कहा गया; रचना मनुचरित्रमु।
- नंदि तिम्मना; रचना पारिजातापहरणमु।
- धूर्जटि, मादय्यगारि मल्लना, अय्यलराजु रामभद्रुडु, पिंगळि सूरना, रामराजभूषणुडु (भट्टुमूर्ति) और तेनालि रामकृष्ण।
ध्यान दें: अष्टदिग्गज की पूरी सूची और संख्या आंशिक रूप से परंपरा है। कुछ कवि कृष्णदेवराय के बाद के शासकों के समय सक्रिय दिखते हैं, और इतिहासकार तेनालि रामकृष्ण के उनके दरबार में होने पर भी सवाल उठाते हैं। तेनालि रामा की मज़ेदार कहानियाँ लोककथाएँ हैं, ठीक वैसे ही जैसे उत्तर भारत में बीरबल की कहानियाँ। उन्होंने माध्व विद्वान व्यासतीर्थ को भी संरक्षण दिया।
डोमिंगोस पाइस की आँखों से विजयनगर
पुर्तगाली घोड़ा व्यापारी डोमिंगोस पाइस लगभग 1520 से 1522 में विजयनगर आए। उनका वृत्तांत, और लगभग 1535 का फ़र्नाओ नूनिज़ का इतिहास, अंग्रेज़ी में रॉबर्ट सीवेल की किताब A Forgotten Empire (1900) में छपे। पाइस लिखते हैं कि यह नगर रोम जितना बड़ा दिखता था और बाज़ार हीरे, मोती, कपड़े और अनाज से भरे थे।
पाइस राजा का भी वर्णन करते हैं: मध्यम क़द, गोरा रंग, चेहरे पर चेचक के कुछ निशान, सुबह जल्दी उठकर तेल लगाकर व्यायाम और कुश्ती करने वाले, और विदेशियों के प्रति विनम्र। वे महानवमी उत्सव का लंबा वर्णन करते हैं, जिसमें नौ दिन तक जुलूस, नृत्य, पशु बलि और सेना की परेड होती थी। ये विवरण एक विदेशी की नज़र से हैं, इसलिए कुछ बातें बढ़ी-चढ़ी हो सकती हैं, पर विजयनगर पर ये सबसे जीवंत समकालीन स्रोतों में हैं।
कृष्णदेवराय के बारे में रोचक तथ्य
- तिरुमला मंदिर में कृष्णदेवराय और उनकी दो रानियों, चिन्ना देवी और तिरुमला देवी, की धातु की मूर्तियाँ हैं; उन्होंने कई बार वहाँ दान दिया।
- हम्पी के विरूपाक्ष मंदिर, एक शैव मंदिर, को भी उनके शिलालेखों में दान दर्ज है, जबकि उनकी अपनी भक्ति वैष्णव थी।
- उनकी मृत्यु के 36 साल बाद, 1565 में तालिकोटा की लड़ाई के बाद विजयनगर नगर लूटा और नष्ट किया गया। हम्पी के खंडहर 1986 से यूनेस्को विश्व धरोहर हैं।
पढ़ाई और प्रोजेक्ट के लिए सुझाव
एक अच्छा प्रोजेक्ट विषय है: “एक पुर्तगाली ने विजयनगर को कैसे देखा”। पाइस के वृत्तांत से तीन बातें चुनें और उनकी तुलना शिलालेखों या आमुक्तमाल्यदा से करें। इससे स्रोतों की तुलना का अभ्यास होता है।
आप Yuga ऐप में कृष्णदेवराय से आवाज़ या टेक्स्ट में बात करके इंटरव्यू का अभ्यास कर सकते हैं। यह उनकी रचना और ऐतिहासिक स्रोतों से बना एक AI पुनर्निर्माण है, असली सम्राट नहीं, और यह ग़लती कर सकता है। प्रोजेक्ट में ऐप को नहीं, मूल स्रोतों और इतिहासकारों को उद्धृत करें। दक्षिण भारत के एक और शासक के लिए राजराज चोल की जीवनी पढ़ें।
लोग क्या पूछते हैं
- कृष्णदेवराय किस वंश के थे?
- कृष्णदेवराय विजयनगर साम्राज्य के तुलुव वंश के थे। विजयनगर पर क्रम से संगम, सालुव, तुलुव और अरविडु वंशों ने राज किया। वे तुलुव नरस नायक के बेटे थे और 1509 से 1529 तक सम्राट रहे। उनके बाद सौतेले भाई अच्युत देवराय गद्दी पर बैठे।
- आमुक्तमाल्यदा किसने लिखी और किस बारे में है?
- आमुक्तमाल्यदा कृष्णदेवराय ने तेलुगु में लिखी। यह तमिल वैष्णव संत आण्डाल की भक्ति और विष्णु से उनके विवाह की कथा है। इसमें राजनीति पर एक भाग भी है, जिसमें व्यापार, बंदरगाहों, किसानों और सिंचाई के बारे में राजा के कर्तव्य बताए गए हैं।
- अष्टदिग्गज कौन थे?
- तेलुगु परंपरा के अनुसार अष्टदिग्गज कृष्णदेवराय के दरबार के आठ महान कवि थे, जिनमें अल्लसानि पेद्दना, नंदि तिम्मना, धूर्जटि और तेनालि रामकृष्ण गिने जाते हैं। सूची आंशिक रूप से परंपरा है; कुछ कवि उनके बाद के शासकों के समय के लगते हैं, इसलिए इतिहासकार इसे पूरी तरह पक्का नहीं मानते।
- डोमिंगोस पाइस कौन थे?
- डोमिंगोस पाइस एक पुर्तगाली घोड़ा व्यापारी थे जो लगभग 1520 से 1522 में विजयनगर आए। उन्होंने नगर, बाज़ार, महानवमी उत्सव और ख़ुद कृष्णदेवराय का आँखों देखा वर्णन लिखा। यह वृत्तांत रॉबर्ट सीवेल की किताब A Forgotten Empire (1900) में अंग्रेज़ी में छपा।
स्रोत
- आमुक्तमाल्यदा (तेलुगु काव्य), कृष्णदेवराय
- A Forgotten Empire: Vijayanagar, Robert Sewell, 1900 (डोमिंगोस पाइस और फ़र्नाओ नूनिज़ के वृत्तांत सहित)
- हम्पी और तिरुमला के विजयनगर शिलालेख
- A History of South India, K. A. Nilakanta Sastri, 1955
- Vijayanagara (New Cambridge History of India), Burton Stein, 1989
- Group of Monuments at Hampi, UNESCO World Heritage Centre