राजा रवि वर्मा का जीवन परिचय
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राजा रवि वर्मा (29 अप्रैल 1848 से 2 अक्टूबर 1906) त्रावणकोर के किलिमानूर के चित्रकार थे, जिन्होंने यूरोपीय तैल चित्रकला सीखकर उससे राजसी चित्र और रामायण, महाभारत व पुराणों के दृश्य बनाए। 1894 में उन्होंने बंबई में लिथोग्राफ़िक प्रेस शुरू किया, जो बाद में लोनावला के पास मालवली गया। वहाँ छपे सस्ते रंगीन चित्र (ओलियोग्राफ़) देश भर के घरों तक पहुँचे और देवी-देवताओं की लोकप्रिय छवि को पीढ़ियों तक गढ़ते रहे।
राजा रवि वर्मा कौन थे
रवि वर्मा का जन्म 29 अप्रैल 1848 को त्रावणकोर रियासत (आज का केरल) के किलिमानूर में एक कुलीन परिवार में हुआ, जिसका त्रावणकोर राजपरिवार से संबंध था। “राजा” उनके परिवार की उपाधि थी, किसी राज्य का शासन नहीं। उनके चाचा राजा राजा वर्मा ख़ुद चित्रकार थे और उन्होंने बचपन में ही उनकी प्रतिभा पहचानी।
युवावस्था में वे तिरुवनंतपुरम के महल में रहकर चित्रकला सीखते रहे। उस समय भारत में तैल रंग (ऑयल पेंट) का प्रयोग नया था और उसकी तकनीक सिखाने वाले कम थे। उन्होंने महल के चित्रकार रामास्वामी नायडू के काम और 1868 में त्रावणकोर आए डच चित्रकार थियोडोर जेन्सन को काम करते देखकर बहुत कुछ ख़ुद सीखा।
राजा रवि वर्मा के जीवन की मुख्य तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 29 अप्रैल 1848 | किलिमानूर, त्रावणकोर में जन्म |
| 1868 | डच चित्रकार थियोडोर जेन्सन का त्रावणकोर आना; रवि वर्मा ने उनसे तकनीक देखी |
| 1873 | मद्रास प्रदर्शनी में पुरस्कार; उसी वर्ष वियना प्रदर्शनी में भी सम्मान |
| 1880 और 1890 का दशक | बड़ौदा के लक्ष्मी विलास महल के लिए पौराणिक चित्रों की शृंखला |
| 1894 | बंबई (घाटकोपर) में रवि वर्मा फ़ाइन आर्ट लिथोग्राफ़िक प्रेस की स्थापना |
| 1899 | प्रेस लोनावला के पास मालवली ले जाया गया |
| 1901 | प्रेस अपने जर्मन तकनीशियन फ़्रिट्ज़ श्लाइशर को बेच दिया |
| 1904 | ब्रिटिश सरकार से कैसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक |
| 2 अक्टूबर 1906 | किलिमानूर में निधन |
चित्रकला: राजसी चित्र और पौराणिक दृश्य
रवि वर्मा की आमदनी और ख्याति की नींव पोर्ट्रेट थे। त्रावणकोर, बड़ौदा, मैसूर जैसे राज्यों के राजा, उनके परिवार और ब्रिटिश अधिकारी उनसे चित्र बनवाते थे। इसके लिए वे देश भर घूमे।
उनका सबसे बड़ा बदलाव पौराणिक चित्रों में था। उन्होंने रामायण, महाभारत और पुराणों के देवताओं और नायकों को पहचाने जा सकने वाले, सुंदर मानवीय रूप में, भारतीय वेशभूषा और परिवेश में, यूरोपीय अकादमिक तैल शैली से चित्रित किया। प्रसिद्ध चित्रों में शकुंतला (कालिदास के नाटक का दृश्य, जिसमें शकुंतला पैर से काँटा निकालने के बहाने पीछे मुड़कर देखती है), हंस-दमयंती, शांतनु और मत्स्यगंधा, समुद्र का गर्व तोड़ते राम, और गैलेक्सी ऑफ़ म्यूज़िशियंस (लगभग 1889) शामिल हैं। गैलेक्सी ऑफ़ म्यूज़िशियंस में देश के अलग-अलग क्षेत्रों की वेशभूषा वाली संगीतकार स्त्रियाँ दिखाई गई हैं।
वेशभूषा और चेहरों का अध्ययन करने के लिए उन्होंने बहुत यात्रा की। अपनी नायिकाओं के लिए वे अक्सर महाराष्ट्र की नौवारी साड़ी चुनते थे, जिसे उन्होंने एक तरह का “अखिल भारतीय” पहनावा बना दिया। उनके भाई सी. राजा राजा वर्मा, जो ख़ुद चित्रकार थे, जीवन भर उनके साथ काम करते रहे।
1894 का लिथोग्राफ़िक प्रेस और ओलियोग्राफ़
तैल चित्र महँगे होते थे और महलों में टँगते थे। रवि वर्मा चाहते थे कि भक्ति और पौराणिक चित्र आम घरों तक पहुँचें। इसके लिए 1894 में उन्होंने बंबई में रवि वर्मा फ़ाइन आर्ट लिथोग्राफ़िक प्रेस शुरू किया और जर्मनी से मशीनें और तकनीशियन मँगवाए।
लिथोग्राफ़ी में चित्र को पत्थर पर बनाकर स्याही से छापा जाता है; रंगीन चित्र के लिए हर रंग का अलग पत्थर लगता है। ओलियोग्राफ़ ऐसे रंगीन छापे होते हैं जिन पर वार्निश या उभार देकर उन्हें तैल चित्र जैसा दिखाया जाता है। प्रेस ने लक्ष्मी, सरस्वती, राम दरबार, कृष्ण और दूसरे देवताओं के ऐसे चित्र बड़ी संख्या में छापे।
ये चित्र पूजा घरों, दुकानों और कैलेंडरों तक पहुँचे। आज हम देवी-देवताओं को जिस रूप में कैलेंडरों और पोस्टरों में देखते हैं, उस पर इन छापों का गहरा असर है। प्रेस 1899 में मालवली गया और 1901 में रवि वर्मा ने उसे अपने जर्मन तकनीशियन फ़्रिट्ज़ श्लाइशर को बेच दिया, जिसने उसे आगे चलाया।
आलोचना और बहस
बीसवीं सदी की शुरुआत में बंगाल स्कूल के कलाकारों और राष्ट्रवादी आलोचकों ने रवि वर्मा की शैली को बहुत यूरोपीय और “नाटकीय” बताया और भारतीय लघुचित्र व अजंता जैसी परंपराओं की ओर लौटने की बात की। इतिहासकार तपती गुहा-ठाकुरता ने इस बहस का विस्तार से अध्ययन किया है।
उनके कुछ चित्रों में देवियों के अर्धनग्न रूप को लेकर उनके समय में भी आपत्तियाँ हुईं। आज कला इतिहासकार उन्हें आधुनिक भारतीय कला के शुरुआती बड़े नामों में गिनते हैं, जिन्होंने छपाई के ज़रिए कला को जनता तक पहुँचाया।
राजा रवि वर्मा के बारे में रोचक तथ्य
- उनके चित्रों का बड़ा संग्रह तिरुवनंतपुरम की श्री चित्रा आर्ट गैलरी और बड़ौदा के लक्ष्मी विलास महल परिसर में है।
- “देयर कम्स पापा” (1893) में उन्होंने एक माँ और बच्चे का घरेलू दृश्य बनाया; माना जाता है कि इसमें उनकी बेटी और नाती हैं।
- उनके जीवन पर बनी हिंदी फ़िल्म रंग रसिया उपन्यास पर आधारित है और उसमें कल्पना बहुत है।
पढ़ाई और प्रोजेक्ट के लिए सुझाव
एक अच्छा प्रोजेक्ट: रवि वर्मा का कोई तैल चित्र और उसी विषय का ओलियोग्राफ़ साथ रखकर तुलना करें। क्या बदला: रंग, आकार, क़ीमत, देखने वाले लोग? इससे कला और तकनीक का संबंध समझ आता है। उन्होंने कालिदास के शकुंतला प्रसंग को चित्रित किया, इसलिए कालिदास की जीवनी भी साथ पढ़ें।
आप Yuga ऐप में राजा रवि वर्मा से आवाज़ या टेक्स्ट में बात करके इंटरव्यू का अभ्यास कर सकते हैं। यह उनके चित्रों और ऐतिहासिक स्रोतों से बना एक AI पुनर्निर्माण है, असली रवि वर्मा नहीं, और यह ग़लती कर सकता है। प्रोजेक्ट में चित्रों, संग्रहालयों और कला इतिहासकारों को उद्धृत करें।
लोग क्या पूछते हैं
- राजा रवि वर्मा का जन्म कब और कहाँ हुआ?
- राजा रवि वर्मा का जन्म 29 अप्रैल 1848 को त्रावणकोर रियासत के किलिमानूर में हुआ, जो आज केरल में है। उनका परिवार त्रावणकोर राजपरिवार से जुड़ा एक कुलीन परिवार था, और “राजा” उसकी उपाधि थी। उनका निधन 2 अक्टूबर 1906 को किलिमानूर में ही हुआ।
- राजा रवि वर्मा ने प्रेस कब और क्यों शुरू किया?
- उन्होंने 1894 में बंबई में रवि वर्मा फ़ाइन आर्ट लिथोग्राफ़िक प्रेस शुरू किया, ताकि देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं के चित्र सस्ते रंगीन छापों के रूप में आम घरों तक पहुँच सकें। 1899 में प्रेस लोनावला के पास मालवली गया और 1901 में उसे बेच दिया गया।
- ओलियोग्राफ़ क्या होता है?
- ओलियोग्राफ़ एक रंगीन लिथोग्राफ़िक छापा होता है जिसे वार्निश या सतह पर उभार देकर तैल चित्र जैसा दिखाया जाता है। रवि वर्मा के प्रेस ने उनके पौराणिक चित्रों के ऐसे छापे बड़ी संख्या में बेचे, जिससे उनकी छवियाँ देश भर में फैलीं।
- राजा रवि वर्मा के प्रसिद्ध चित्र कौन से हैं?
- उनके प्रसिद्ध चित्रों में शकुंतला, हंस-दमयंती, शांतनु और मत्स्यगंधा, समुद्र का गर्व तोड़ते राम, गैलेक्सी ऑफ़ म्यूज़िशियंस (लगभग 1889) और देयर कम्स पापा (1893) शामिल हैं। साथ ही उन्होंने राजाओं और अधिकारियों के बहुत से औपचारिक पोर्ट्रेट बनाए।
स्रोत
- राजा रवि वर्मा के चित्र और रवि वर्मा फ़ाइन आर्ट लिथोग्राफ़िक प्रेस के छापे
- Raja Ravi Varma: Painter of Colonial India, Rupika Chawla, 2010
- The Making of a New 'Indian' Art: Artists, Aesthetics and Nationalism in Bengal, c. 1850 to 1920, Tapati Guha-Thakurta, 1992
- When Was Modernism: Essays on Contemporary Cultural Practice in India, Geeta Kapur, 2000